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निर्मल भारत की जरूरत क्यों

सरिता बरारा

Updated Tue, 16 Oct 2012 09:43 PM IST
article of sarita barara on nirmal bharat yojana
बॉलीवुड अभिनेत्री विद्या बालन और ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने गांधी जयंती के दिन निर्मल भारत अभियान की घोषणा की थी। इसके अगले दिन वर्धा में गांधी आश्रम से यह यात्रा आरंभ हुई। एक अरसे के बाद एक ऐसी यात्रा की बात सुनी गई, जो किसी नेता के निजी राजनीतिक एजेंडा का हिस्सा नहीं, बल्कि आम आदमी की मूलभूत जरूरत से जुड़ी है।
ऐसे अभियान लगातार होने चाहिए, पर सवाल यह है कि हमारे देश की आजादी के 65 वर्षों के बाद भी इसकी जरूरत क्यों आन पड़ी? इसके पीछे क्या हमारी नीतियों और उनके लागू करने में ही कमियां थी, या फिर स्वच्छता को, जिसका हमारी सेहत से सीधा संबंध है, प्राथमिकता नहीं दी गई। हमारे देश में आज भी आधे से ज्यादा लोग खुले में शौच करते हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अनुसूचित जातियों से संबंधित 76 प्रतिशत परिवारों, जनजातियों के 68 प्रतिशत परिवारों, अन्य  पिछड़ा वर्ग के 68 प्रतिशत परिवारों और अन्य जातियों के 43 प्रतिशत परिवारों के घरों में शौचालय की सुविधा नहीं है। केवल ग्रामीण इलाकों में ही तीन करोड़ लोग हर वर्ष गंदगी और अस्वच्छता से जुड़ी बीमारियों का शिकार होते हैं।

सरकार ने संपूर्ण स्वच्छता अभियान की शुरुआत 1999 में की थी और 2003  में इसके अंतर्गत पंचायतों और दूसरे स्थानीय निकायों को शौचालय बनाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए निर्मल गांव पुरस्कार योजना लाई गई। संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत शौचालय बनाने के लिए प्रोत्साहन के तौर पर खर्चे में हिस्सेदारी के अलावा सभी स्कूलों और आंगनबाड़ियों में शौचालय बनाने का लक्ष्य रख गया, जो अब तक पूरा नहीं हो पाया है।

सरकार का खुद का मानना है कि इस अभियान की प्रगति धीमी रही है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों से छह महीनों के अंदर सभी स्कूलों में शौचालयों और पीने की पानी की सुविधा प्रदान करने को कहा है। यह बात सब जानते हैं कि स्कूलों में शौचालयों के न होने का असर लड़कियों की पढ़ाई पर पड़ता है, क्योंकि ऐसे स्कूलों में माता-पिता उन्हें भेजने के लिए तैयार नहीं होते।

गांवों में कमजोर तबके के लोगों के लिए शौचालय बनाने के लिए अब तक 3,200 से 3,700 रुपये की सहायता राशि (जिसमें केंद्र, राज्यों और लाभार्थियों की हिस्सेदारी है) का प्रावधान था। इससे जाहिर है, शौचालय का निर्माण नहीं किया जा सकता था और जिनके पास घर के नाम पर कच्ची दीवारों का ढांचा हो, उनसे इस बात की उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे बाकी की राशि जुटा पाएंगे।

इसका नतीजा यह हुआ कि बहुत जगह या तो खानापूर्ति के लिए शौचालय के नाम पर इंटों का ढांचा खड़ा कर दिया गया या फिर शौचालय कागजों में बन गए और पैसा भ्रष्ट सरपंचों और प्रधानों की जेबों में गया। सरकार ने अब यह राशि 10,000 रुपये तक बढ़ाने का फैसला लिया है। यह कहना कठिन है कि इसका कितना प्रतिशत शौचालयों के निर्माण पर खर्च होगा और कितना भ्रष्टाचार की आहूति चढ़ेगा।

जो भी हो संपूर्ण स्वच्छता को प्राप्त करने के लिए अब सरकार गंभीर दिखाई दे रही है और अगले 10 वर्षों में इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसी दिशा में 12वीं पंचवर्षीय योजना में ग्रामीण स्वच्छता के लिए पिछली पंचवर्षीय योजना के 7,800 करोड़ के मुकाबले 36,000 करोड़ रुपये के प्रावधान को मंत्रिमंडल ने हाल में मंजूरी दी। सरकार ने 2008 में शहरों में स्वच्छता पर भी एक राष्ट्रीय नीति तैयार की थी।

मगर आज भी सड़कों, झुग्गी-झोंपड़ियों या रेलवे ट्रैक के आसपास रहने वाले लाखों लोगों के पास खुले में शौच करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि सार्वजनिक शौचालय या तो हैं नहीं, या उनकी हालत बेहद खस्ता है। शौचालयों के निर्माण और रखरखाव के लिए पानी की उपलब्धता और दूसरी तकनीक अपनाने की भी जरूरत है, ताकि इसका बोझ समाज के कमजोर वर्ग पर न पड़े।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, ‘जिस दिन हर किसी के पास शौचालय इस्तेमाल करने के लिए होगा, मैं समझूंगा कि हम प्रगति के शिखर पर पहुंच चुके हैं।' क्या अगले दस वर्षों में हम इस शिखर तक पहुंच पाएंगे?
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