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कामराज योजना ऐसी तो नहीं थी

नीरजा चौधरी

Updated Thu, 01 Nov 2012 10:19 PM IST
article of neeraja chaudhari
अब जबकि मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में फेरबदल हो चुका है, अनुमान है कि आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर जल्दी ही कांग्रेस में भी सांगठनिक स्तर पर नए सिरे से जोश भरने का काम होगा। वजह भी साफ है, देश के 11 राज्यों में अगले 12 महीनों में चुनाव होने हैं और फिर 2014 के आम चुनाव में पार्टी को जनता के बीच जाना है।
पर जिस कामराज योजना के तहत सात मंत्रियों (चार कैबिनेट और तीन राज्य मंत्री) की सरकार से विदाई की गई है, उसका उद्देश्य पार्टी को मजबूत करना होना चाहिए था, जबकि ऐसा दिखता नहीं। वर्ष 1963 में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री के कामराज और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने मिलकर कामराज योजना को मूर्त रूप दिया था।

उस योजना के अंतर्गत करीब आधे दर्जन केंद्रीय मंत्री और करीब इतने ही मुख्यमंत्रियों ने इस्तीफा दिया था। उस योजना का उद्देश्य था, बतौर पार्टी कांग्रेस को मजबूत करना, पर वास्तव में उसने नेहरू को अपनी नई टीम बनाने के लिए स्वतंत्र कर दिया था, जिसकी छवि 1962 के चीनी युद्ध के कारण धूमिल हुई थी।

तब जिन्होंने इस्तीफा दिया था, उनमें मोरारजी देसाई, बीजू पटनायक, एसके पाटिल जैसे सशक्त नेता भी थे। लिहाजा यूपीए का वर्तमान फेरबदल कामराज योजना का हिस्सा नहीं लगता। जिन सात मंत्रियों से इस्तीफे लिए गए हैं, उन्हें भी अलग-अलग वजह बताई गई।



मसलन, सोनिया गांधी ने अंबिका सोनी को कहा कि वह अगले डेढ़ साल के लिए पार्टी को मजबूत करने के लिए संगठन में काम करें। सरकार का हिस्सा बनने से पहले सोनी संगठन के कामों के लिए ही जानी जाती थीं और अहमद पटेल के साथ वह भी सोनिया गांधी की राजनीतिक सचिव थीं।

क्या अब वह फिर से कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सचिव की जिम्मेदारी अहमद पटेल के साथ बाटेंगी? वह पहले की तरह शायद ही कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव बनना पसंद करें। राहुल गांधी ने पार्टी में नंबर दो की भूमिका स्वीकार करने की मंजूरी लगभग दे दी है। ऐसी सूरत में महासचिवों की उनकी अपनी टीम होगी।

इसी तरह, भले ही एसएम कृष्णा, मुकुल वासनिक और सुबोध कांत सहाय को भी मंत्रियों की जिम्मेदारी से मुक्त किया गया है, उनकी भी वजहें अलग-अलग हो सकती हैं। कृष्णा का स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा और 2011 के फेरबदल में यह अनुमान भी था कि वह सरकार से अलग हो जाएंगे, पर प्रधानमंत्री उनके पक्ष में सामने आए थे।

अब कृष्णा ने स्पष्ट कर दिया है कि वह पार्टी का काम करने में सक्षम नहीं हैं, यहां तक कि अपने गृह राज्य में भी अगले आम चुनाव तक केंद्रीय भूमिका निभाने में उन्हें कठिनाई होगी। इसी तरह, सुबोध कांत सहाय को कोलगेट प्रकरण की वजह से पद से हाथ धोना पड़ा, जबकि मुकुल वासनिक को देर से ही सही, बिहार राज्य विधानसभा चुनाव में अपनी साख खोने का खामियाजा भुगतना पड़ा है।

वासनिक के लिए पार्टी में शायद ही कोई भूमिका हो। जहां तक अगाथा संगमा का सवाल है, उन्हें तभी एनसीपी प्रमुख शरद पवार को इस्तीफा सौंपने को मजबूर किया गया था, जब उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ अपने पिता पूर्णो संगमा के पक्ष में प्रचार किया था।

लिहाजा जहां तक मंत्रियों से लिए गए इस्तीफों का सवाल है, संगठन के पुनर्निर्माण के संदर्भ में वर्तमान फेरबदल कोई स्पष्ट संदेश देता नहीं दिख रहा। अब सबकी नजरें पार्टी में राहुल गांधी की भूमिका और उनकी नई टीम पर है। वर्तमान फेरबदल में कई युवा मंत्रियों का कद बढ़ाया गया है, जैसे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को ऊर्जा और सचिन पायलट को कॉरपोरेट मामलों का स्वतंत्र राज्य मंत्रालय दिया गया, अजय माकन और पल्लम राजू को कैबिनेट मंत्री का दरजा मिला, पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी को सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री बनाया गया है।

यानी, राहुल गांधी के युवा बिग्रेड को तरजीह तो दी गई है, लेकिन पूरी उनकी ही चली, यह सही नहीं है। मीडिया में मीनाक्षी नटराजन, प्रदीप मांझी, अशोक तंवर, माणिक टैगोर और ज्योति मिर्धा की भी खूब चर्चा थी। लेकिन इन्हें निराशा हाथ लगी। क्या ये लोग खुद उन मंत्रालय का जिम्मा नहीं संभालना चाहते थे, जो इनकी प्रतिष्ठा को आंच पहुंचाए, या फिर संगठन में राहुल गांधी का साथ देने के लिए इन्हें रोक गया?

मामला जो भी हो, यह तसवीर आने वाले दिनों में ही स्पष्ट होगी। वर्तमान फेरबदल आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस द्वारा की गई गलती को आखिरकार दुरुस्त करने की कवायद की तरफ भी इशारा कर रहा है। ममता बनर्जी के सरकार से बाहर जाने के साथ ही पश्चिम बंगाल पर ध्यान केंद्रित किया गया है और वहां के तीन मंत्रियों को भी अब सरकार में शामिल किया गया है।

इसी तरह, दक्षिण में जगन मोहन रेड्डी के पार्टी छोड़ने और अलग तेलंगाना राज्य की मांग तेज होने के बाद कमजोर पड़े आंध्र प्रदेश के गढ़ को मजबूत करने की कोशिश पार्टी ने की है। न सिर्फ चिरंजीवी को सरकार में शामिल किया गया है, बल्कि पल्लम राजू का कद बढ़ाया गया है। यह बदलाव वहां के कपु समुदाय को आकर्षित करने की कोशिश है, क्योंकि दोनों इसी समुदाय से संबंध रखते हैं।

इसी तरह, पुरंदेश्वरी देवी को, जो कामा समुदाय से हैं, वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री बना दिया गया है। प्रधानमंत्री ने आंध्र प्रदेश में जातिगत और क्षेत्रीय संतुलन को दोबारा पाने के लिए चार अन्य नेताओं को भी राज्य मंत्री बनाया, जिसमें एक दलित, एक तेलंगाना का मडिग, एक रेड्डी और एस जगन रेड्डी के रायलसीमा क्षेत्र का है।  

कुल मिलाकर कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश की नब्ज पकड़ने की कोशिश की है, जो 2004 और 2009 में उसके केंद्र में सत्तासीन होने का मुख्य रास्ता था। लेकिन चाहे बात आंध्र प्रदेश की हो या कहीं और की, मंत्रियों की नियुक्ति कर सांकेतिक संदेश देने से ज्यादा जरूरी है कि पार्टी कुछ विशेष पहल करे।
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