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सुधारों से पहले महंगाई रोकिए

मधुरेंद्र सिन्हा

Updated Sun, 14 Oct 2012 08:48 PM IST
article of madhurendra sinha
मनमोहन सिंह ने अपनी पार्टी और सरकार को बचाने के लिए आर्थिक सुधारों की झड़ी लगा दी है। मल्टी ब्रांड रिटेल, बीमा और पेंशन में 49 प्रतिशत तक की एफडीआई जैसे बड़े कदमों के अलावा कई छोटे कदम भी उठाए गए हैं। पी चिदंबरम की वित्त मंत्री के रूप में वापसी के साथ ही कई घोषणाएं हो रही हैं। जाहिर है, इतने दिनों की जड़ता को सरकार एक झटके में उखाड़ फेंकना चाहती है। सरकार के मुताबिक, इन कदमों से खुशहाली आएगी, विकास दर फिर ऊंचाइयों पर पहुंचेगी तथा रोजगार के अवसर और आय में बढ़ोतरी होगी।
आर्थिक सुधार के क्रम में सरकार ने जो बड़ा कदम उठाया, वह सबसिडी घटाने का था। डीजल और रसोई गैस पर सबसिडी घटाने का जो काम किया गया, वह आर्थिक दृष्टि से भले ठीक हो, लेकिन मध्य और निम्न मध्यवर्ग के लिए बेहद कष्टदायक है। इसकी वजह है, महंगाई का भयानक दंश। पिछले कुछ वर्षों से लोग महंगाई से बेहद परेशान हैं और उनका जीवन कठिन होता जा रहा है। ऐसे में डीजल के दाम बढ़ने से सभी तरह के सामान की कीमत बढ़ गई है। सिलिंडरों की संख्या पर अंकुश लगते ही उनका भी खर्च बढ़ गया। ऐसे में जनता आर्थिक सुधार की बातों पर किस तरह ध्यान देगी? सरकार के अपने खर्च बढ़ते ही जा रहे हैं। वह अपना खर्च कम करने की बातें तो करती है, भारी कटौती करना नहीं चाहती। हां, दिखावे के लिए कभी-कभी कुछ घोषणाएं करती रहती है।

महंगाई का मामला ऐसा है कि उससे दो-दो हाथ किए बगैर सरकार आर्थिक सुधारों का लाभ जनता तक नहीं पहुंचा सकती। इस समय खाने-पीने की वस्तुओं के दाम आसमान पर हैं। देश में गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन होने के बावजूद आटे के भाव पिछले साल की तुलना में 10 प्रतिशत से अधिक बढ़े हुए हैं। मानसून की कमी की आशंका से चावल के दाम दो महीने पहले जो बढ़े, वे अब तक नीचे नहीं आए। खाद्य तेलों के दाम हैरतअंगेज रूप से बढ़ गए हैं। गरीबों के इस्तेमाल में आने वाला सरसों तेल सौ रुपये की सीमा कब का पार कर चुका है। चीनी के दाम में आई तेजी उसकी मिठास कम कर रही है। त्योहारों में उसके दाम गिरने की संभावना तो दूर, उलटे भाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। शहरों में स्कूलों की फीस और मकानों के किराये बढ़ते जा रहे हैं। जिन लोगों ने कर्ज लेकर मकान बनवाए हैं, उनकी ईएमआई बढ़ गई है। यानी सब कुछ बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है।

वित्त मंत्री ने अब यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि कम बारिश के कारण खाने-पीने की चीजों के दाम ऊंचे रहेंगे। उनके मुताबिक, थोक महंगाई की दर इस साल के बचे महीनों में आठ प्रतिशत तक रहेगी। यानी महंगाई से कोई निजात नहीं। इस बार सरकार महंगाई की जिम्मेदारी मानसून पर थोप रही है, लेकिन तथ्य बताते हैं कि पिछले वर्षों में ऐसी कोई बात नहीं थी और महंगाई तब भी बढ़ी थी। सरकार ने अपनी ओर से उसे थामने का कोई प्रयास नहीं किया। हां, रिजर्व बैंक इसे थामने के नाम पर ब्याज दरें जरूर बढ़ाता चला गया, जिससे महंगाई तो नहीं रुकी, बल्कि कर्ज लेकर वाहन या मकान खरीदने वालों की मुसीबतें बढ़ गईं। बढ़ी हुई ब्याज दरों से उनके घर का बजट बिगड़ गया।

मौद्रिक नीति के बूते महंगाई को थामने की नीति अपने देश में नहीं चल सकती, क्योंकि यहां आज भी अनाज और फल-सब्जियों का थोक कारोबार नकद में होता है। लेकिन रिजर्व बैंक के गवर्नर अपनी जिद पर कायम हैं। महंगाई घटाने की जिम्मेदारी सरकार की भी है, और इसके लिए जरूरी है कि खाने-पीने के सामान की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। लेकिन यह तभी संभव होगा, जब राज्य सरकारें भी इसमें सहयोग करें। इस समय देश में अनाज की जमाखोरी बढ़ती जा रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गेहूं है, जिसकी धड़ल्ले से जमाखोरी की जा रही है।
 
बड़ी-बड़ी मिलें और थोक व्यापारी इस समय गेहूं का बड़े पैमाने पर स्टॉक कर रहे हैं, जिससे आटे के दामों में भारी इज़ाफा हुआ है। यही हाल चावल का है, जिसके दाम पिछले साल की तुलना में 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं।
महंगाई बढ़ाने में सटोरियों का भी बड़ा हाथ रहा है, जिन्होंने अनाज पर बड़े पैमाने पर सट्टा लगाया है। सरकार ने न तो इसके खिलाफ कोई बड़ा कदम उठाया और न ही इस ओर कभी गंभीरता से ध्यान दिया। वायदा कारोबार के बहाने अनाज के दाम अनाप-शनाप ढंग से बढ़ाए गए। चना आज इतना महंगा हो गया है, तो यह वायदा कारोबार का ही नतीजा है। वायदा कारोबार की आड़ में उन अनाज के भी दाम बढ़ाए गए, जिनके कारोबार की अनुमति नहीं थी। अब सरकार वायदा कारोबार आयोग को और अधिक अधिकार देने की बात कर रही है। लेकिन इस दिशा में कार्रवाई तो उसे ही करनी होगी।

जाहिर है, सरकार के वर्तमान आर्थिक सुधारों का परिणाम आने में काफी वक्त लगेगा और तब तक उसकी लोकप्रियता और घट चुकी होगी। जहां तक आम आदमी का सवाल है, तो उसकी दिलचस्पी आर्थिक सुधार के बजाय इसमें है कि महंगाई कितनी जल्दी घटती है। आर्थिक सुधार उसके लिए कोई वरीयता नहीं है, क्योंकि इससे उसे निकट भविष्य में कोई राहत मिलती नहीं दिखती। सरकार अगर आम आदमी की परेशानी दूर नहीं करती, तो इन आर्थिक सुधारों का कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि ये दीर्घकालीन कदम हैं, जबकि लोगों को तुरंत समाधान चाहिए।
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