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राष्ट्रपति का लोकतांत्रिक चेहरा

कुमार प्रशांत

Updated Mon, 29 Oct 2012 10:37 PM IST
article of kumar prashant
इतनी जुल्मत की नशेमन भी नजर आ ना सके/ काश बिजली ही गिरे कोई गुलिश्ता के करीब...
इन दिनों ऐसा ही हाल है मुल्क का! इतनी निराशा और बदहाली है हर तरफ कि कहीं से आस भरी, उमंग भरी खबर आती दिखाई-सुनाई नहीं देती है। ऐसे में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की तरफ से कुछ ऐसी बातें आ गईं कि लगा कि इसे किसी अंधेरे में गुम नहीं होने देना चाहिए! 

हमारे यहां गोरे शासकों का जाना और काले शासकों का आना कुछ इस तरह हुआ कि हमें किसी नएपन का बोध ही नहीं हुआ। आजादी के जश्न से बहुत दूर बैठे, एकाकी, बूढ़े गांधी ने जरूर जोर से बीबीसी के नुमाइंदे से कहा कि अब दुनिया को बता दो कि गांधी अंगरेजी भूल गया है, ताकि आजाद भारत से बात करनी हो, तो इसकी अपनी भाषा की अहमियत दुनिया समझे!

लेकिन हम तो भाषा, भाव, तेवर, तरीके और तमन्ना, सभी स्तरों पर अंगरेजों के उतारे गंदे कपड़े पहनने में इस कदर जुटे थे कि दूसरों के कपड़े पहनने से भी नंग होती है, इसका हमें आभास ही नहीं रहा! इसलिए राजनीतिक आजादी तो आई, लेकिन एक आजाद मुल्क का मन नहीं आया, क्योंकि उसके लिए खुद से एक बड़ी लड़ाई लड़ने की जरूरत थी।

राष्ट्रपति की कुरसी पर गांधी जी के अनन्यतम भक्त राजेन्द्र प्रसाद बैठे। गांधी जी की विरुदावलि गाने वाले दार्शनिक राधाकृष्णन बैठे। गांधीजी की नई तालीम के ज्ञाता जाकिर हुसैन बैठे। बैठे सब... पर कोई खड़ा नहीं हुआ! किसी ने नहीं कहा कि सेवाग्राम वाले गांधी के देश का राष्ट्रपति कैसे रहेगा।

अंगरेज वायसराय की कुटिया तब जैसी तड़क-भड़क में रहती थी, उस पर तब इस गरीब देश का पैसा उड़ाया जाता था, आज उससे कई गुना ज्यादा पैसा उड़ाया जा रहा है। ऐसे में प्रणब बाबू ने ऐसा क्यों कहा कि हमारे देश में राष्ट्रपति को जिस तरह संबोधित करते हैं, उससे उन्हें असहजता होती है और इसलिए इसे तुरंत बदला जाए?

हिंदी में राष्ट्रपति को महामहिम कहते-लिखते हैं, तो अंगरेजी वाले योर एक्सेलेंसी या ऑनरेबल या हिज हाइनेस आदि कहते हैं। ऐसा ही हमारी दूसरी भाषाओं में भी होगा। इंग्लैंड में बैठी सत्ता का सबसे बड़ा नुमाइंदा होता था वायसराय। तो उसे देशवासियों से दूरी बनाए रखने, अपनी विशिष्टता का तिलिस्म जमाए रखने के लिए ऐसे सारे टोने-टोटके करने पड़ते थे।

पर हमारा राष्ट्रपति तो जनता का प्रथम सेवक है। यदि जनता राजा है और सत्ता सेवक है, तब तो प्रतीक भी बदलने होंगे, भाषा व संबोधन भी बदलने होंगे। सवाल कई हैं। प्रणब बाबू से ही हम सारे सवालों का जवाब मांगें, तो यह उनके साथ ज्यादती होगी।

राष्ट्रपति भवन से जारी किए गए नए निर्देश के मुताबिक अब उनके नाम के साथ सिर्फ सम्मानीय राष्ट्रपति ही लिखा जाएगा। ऐसा ही राज्यपालों के साथ भी होगा। सरकारी कागजातों में भी अब इसका ही पालन होगा। बिहार के ललित नारायण मिश्र मिथिला विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में जाने से पहले राष्ट्रपति भवन से आयोजकों को बताया गया कि उनका नाम श्री प्रणब मुखर्जी भर लिखा जाए और उनके बैठने के लिए किसी खास तरह की कुरसी न रखी जाए। सुखद है कि ऐसा ही हुआ। अब वही नियमों में ढाला जा रहा है।

राष्ट्रपति जब भी किसी कार्यक्रम के लिए शहर में निकलते हैं, तो उनके लिए यातायात के नियमों में जैसे परिवर्तन किए जाते हैं और उनके साथ जैसा काफिला होता है, उस कारण आम नागरिकों को बहुत मुसीबत होती है। इसलिए यह भी सूचना जारी की गई है कि राजधानी में यदि राष्ट्रपति को किसी समारोह में बुलाया जाए, तो यथासंभव कोशिश की जाए वह समारोह राष्ट्रपति भवन के परिसर में ही हो।

यह अच्छा रास्ता खोजा गया है। बहुत बड़ी और खूब चमचमाती कार और उसके साथ चमकती दूसरी कारों का लंबा काफिला भी यदि कम कर दिया जाए, तो राष्ट्रपति भले आदमी की तरह किसी भी समारोह में, कहीं भी जा सकेंगे! जरूरत इसकी है कि देश का नागरिक देख सके कि वह जिस रास्ते से गुजरता है, उसका राष्ट्रपति भी उसी रास्ते गुजरता है। यह राष्ट्रपति को साधारण बनाना नहीं है, उसका लोकतांत्रिकरण करना है।

राष्ट्रपति बनते वक्त प्रणब बाबू ने कहा था कि वह ऐसा सक्रिय राष्ट्रपति बनना चाहते हैं, जो सांविधानिक जिम्मेदारियों को समझने, परिभाषित करने और समाज के सामने रखने में लगा हुआ है। जानकार बताते हैं कि अपने दोहरे कार्यकाल में राजेन्द्र बाबू ने प्रधानमंत्री, मंत्रिमंडल, न्यायपालिका, विधायिका आदि से जो संवाद किया, जिनके लिखित दस्तावेज उपलब्ध हैं, वे सारे संवाद बड़े ही महत्व के हैं।

उन दस्तावेजों के आधार पर अब नए राष्ट्रपतियों को अपनी जिम्मेदारी निभानी है। इसलिए संविधान के सर्वप्रथम संरक्षक के रूप में प्रणब बाबू को यह बताना ही चाहिए कि सरकारी लोग जब कैग पर हमला करते हैं, न्यायपालिका से कहा जाता है कि वह अपनी मर्यादा में रहे, उनकी सरकार का कोई मंत्री खुले आम भ्रष्टाचार का अपराधी साबित होता है, आदि-आदि तो राष्ट्रपति के रूप में वह इसे कैसे देखते हैं?

हमारा संसदीय लोकतंत्र तेजी से अपनी अर्थवत्ता खोता जा रहा है। ऐसे में प्रणब बाबू जैसा जमीन से उठकर आसमान में पहुंचा आदमी राष्ट्रपति है, तो यह तथ्य सुकून भी देता है और आशंकित भी करता है। सुकून यह कि अगर प्रणब बाबू सैकड़ों कमरों की इस झोंपड़ी में खो न गए, तो बात संबोधन, कुरसियों आदि से आगे जरूर जाएगी।
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