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आर्थिक सुधार समय की जरूरत

अरुण नेहरू

Updated Fri, 07 Dec 2012 09:15 PM IST
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हम लोग इस समय चुनावी दौर में हैं। हर राजनीतिक दल की एक आंख चुनावों पर टिकी है। वैसे इसमें कुछ गलत भी नहीं है। खुदरा क्षेत्र में एफडीआई को संसद के दोनों सदनों से पारित कराने में तो सरकार सफल रही। अब इसी महीने आने वाले हिमाचल और गुजरात के चुनावी नतीजे अहम होंगे। मैं एफडीआई की खूबियों की बात नहीं करूंगा, पर जैसा कि मैं पहले लिख चुका हूं कि यह वैश्विक निवेशकों के बीच विश्वास बहाल करने वाला जरूरी कदम है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक सुस्ती के कारण और भी आवश्यक है।
राजनीतिक तर्क तो कहता है कि आम चुनाव मई, 2014 में होंगे, लेकिन अगर कुछ राजनीतिक दुर्घटनाएं हो गईं, तो यह अगले साल अक्तूबर/नवंबर में भी हो सकता है। एफडीआई के मुद्दे पर वामपंथी जहां शीतयुद्धकालीन मानसिकता का परिचय देते नजर आए, वहीं भाजपा अपने व्यापारी मतदाताओं को बचाने की जुगत में लगी हुई है। चुनाव की आहट को देखते हुए दोनों दलों का यह रुख स्वाभाविक है।

हम हर हफ्ते बिग बाजार से सामान खरीदते हैं और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए नजदीकी किराने की दुकान पर निर्भर हैं। मैं विपक्षी दलों का यह तर्क नहीं समझ पा रहा कि कैसे एक की मौजूदगी दूसरे को खत्म कर देगी। और सच तो यह है कि किराना की अनेक दुकानें अब कॉफी शॉप, ब्यूटी पार्लर, हेयर कटिंग सैलून और यहां तक कि हेयर ट्रांसप्लांट क्लीनिक में तबदील हो गई हैं। हम रोजाना नई दुकानें देखते हैं। इस तरह दुकानदार तो आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन अपनी मानसिकता में विपक्षी राजनेता पीछे की तरफ लौट रहे हैं।

गुजरात में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है। भाजपा और कांग्रेस, दोनों वहां सम्मान के लिए जूझ रही हैं। वैसे नरेंद्र मोदी वहां विजयी होते प्रतीत हो रहे हैं। यह अलग बात है कि राष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रभाव की बढ़ोतरी में इस जीत के अंतर की अहम भूमिका होगी।

घटनाएं अकसर फैसलों से आगे निकल जाती हैं और राजनीतिक दुर्घटनाओं का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। फिर भी, मौजूदा हालात में भविष्य के लिए मैं तीन परिस्थितियां देख रहा हूं। ये हैं, कांग्रेस, भाजपा और तीसरा मोरचा। ये तीनों ही भविष्य की व्यूह रचना में लगे हैं, ऐसे में किसी एक को विजयी बताने का औचित्य नहीं है।

मैं नहीं मानता कि हिमाचल प्रदेश के नतीजे बहुत नजदीकी होंगे या नरेंद्र मोदी की बड़ी जीत भाजपा में उनके भविष्य का एक दृढ़ संकेत साबित होने वाली है। मेरे खयाल से नए साल के पहले छह महीने तीनों समूहों के लिए महत्वपूर्ण होंगे और इस दौरान उनमें किए गए बदलाव का नतीजा भविष्य में दिखेगा।

कांग्रेस या भाजपा की तुलना में तीसरे मोरचे में मुझे ज्यादा समस्याएं दिख रही हैं, क्योंकि उसमें राज्यों के शीर्ष नेता दूसरे क्षेत्रीय शीर्ष नेताओं को स्वीकार नहीं कर पाएंगे, लिहाजा वहां अहं का संघर्ष निरंतर चलता रहेगा। फिर भी मेरा अनुमान है कि तीसरे मोरचे के पास, जो अभी राजनीतिक तौर पर एकजुट नहीं हुए हैं, 260-270 सीटें होंगी।

हम देख रहे हैं कि वाम दलों और दूसरी छोटी पार्टियों के साथ मुलायम सिंह एक धर्मनिरपेक्ष मोरचे के गठन की ओर बढ़ रहे हैं। इस समूह के पास करीब 100 सीटें जीतने की क्षमता है। लेकिन बहुत कुछ इस पर निर्भर है कि बसपा कितनी सीटें जीतती है। इसी तरह अन्नाद्रमुक, तृणमूल कांग्रेस, जनता दल (यू), शिरोमणि अकाली दल, शिवसेना, बीजद, वाईएसआर कांग्रेस भी तकरीबन 100 सीटें जीत सकती हैं।

एक अहम सवाल यह भी है कि सभी क्षेत्रीय ताकतें क्या सत्ता-विरोधी लहर में खुद को बचा पाएंगी। मौजूदा परिस्थिति में अन्नाद्रमुक और शिअद को छोड़कर सभी दल दबाव में हैं। इन दोनों समूहों का नेतृत्व मुलायम सिंह, जयललिता, मायावती, ममता बनर्जी और नीतीश कुमार में से किन्हीं दो के नेतृत्व में जाएगा, और ये दोनों सत्ता में आने के लिए न सिर्फ एक-दूसरे से, बल्कि कांग्रेस और भाजपा से मोल-भाव करेंगे।

वक्त कांग्रेस का इंतजार नहीं करेगा कि वह कब अपने बदलावों को अमली जामा पहनाती है। इसी तरह समय भाजपा की प्रतीक्षा भी नहीं करेगा कि वह कब तक अपने शीर्ष नेतृत्व का संकट सुलझाती है। न ही क्षेत्रीय दलों और नवगठित आम आदमी पार्टी को अपनी तैयारी के लिए लंबा वक्त मिल पाएगा। यह हालांकि सुखद है कि राजनीतिक और आर्थिक मोरचों पर कुछ सकारात्मक चीजें हुई हैं।

अच्छी बात यह है कि राजनीतिक दलों ने अपनी खोई जमीन वापस पा ली है। यह इसी का सुबूत है कि न तो अन्ना हजारे की तीन दिवसीय ओडिशा यात्रा सुर्खियों में आ पाई, न ही विदेशी वस्तुओं को जलाने का बाबा रामदेव का हथकंडा ध्यान खींच पाया, और तो और, अरविंद केजरीवाल के साप्ताहिक खुलासे भी मुख्य खबर बनने के बजाय अखबारों के बीच के पृष्ठों में दम तोड़ देते हैं।

मैं यह नहीं समझ पाता कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों से मुकाबला करते वक्त हम खुद को कमतर क्यों मान लेते हैं! यह देखने की चीज है कि पिछले दो दशकों में भारतीय उद्योग ने कितनी तरक्की की है। हम अपने व्यापार क्षेत्र के प्रभावी प्रदर्शनों को स्वीकारने के बजाय चमत्कारों में ज्यादा यकीन करते हैं। जबकि सच यह है कि हम दुनिया की सर्वश्रेष्ठ चीजों से मुकाबला करने में सक्षम हैं। हमें आर्थिक सुधारों के साथ-साथ पारदर्शी होने की भी जरूरत है।
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