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वे बासठ को भूल चुके हैं

अनिल आजाद पांडेय

Updated Mon, 22 Oct 2012 06:35 PM IST
article of anil ajad pandey on indo china war
भारत-चीन युद्ध के पांच दशक बाद दोनों देशों के रिश्तों में नई गरमाहट है। द्विपक्षीय व्यापार 74 अरब डॉलर को पार कर चुका है। दो साल से रुके सैन्याभ्यास को फिर से शुरू करने की घोषणा से उम्मीद पैदा हुई है। सीमा विवाद और न गहराए, इसके लिए साझा व्यवस्था पर दोनों पक्ष तैयार हो गए हैं। दोनों देशों को इसका एहसास हो चुका है कि संबंध सिर्फ सीमा के मुद्दे पर आकर स्थिर नहीं हो सकते हैं, क्योंकि कई क्षेत्रों में व्यापक सहयोग और आदान-प्रदान की साझा संभावनाएं हैं।
अगर दो क्षण रुककर पचास साल पहले के घटनाक्रम पर नजर दौड़ाएं, तो कुछ चीजें साफ होती हैं। ब्रिटिश पत्रकार नेविले मैक्सवेल ने अपनी चर्चित पुस्तक इंडियाज चायना वार में लिखा है कि भारत द्वारा युद्ध का फैसला जल्दबाज़ी में उठाया गया कदम था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने सेनाधिकारियों पर आंख मूंदकर भरोसा किया और चीन को कमजोर समझने की गलती की।

कुछ चीनी विश्लेषकों का मानना है कि सोवियत संघ और चीन के रिश्तों में आई दरार के कारण भारत यह समझ बैठा था कि चीन उतना ताकतवर नहीं रहा। जबकि चीन को संघर्षों का अच्छा अनुभव था। माओ त्से तुंग और जन मुक्ति सेना के अधिकारी नेहरू और उनके सैन्य रणनीतिकारों से कहीं बेहतर थे। बाद में नेहरू ने संसद में खुद स्वीकार किया था कि हम आधुनिक सचाई से दूर हो गए थे, हम एक बनावटी माहौल में रह रहे थे, जिसे हमने ही तैयार किया था।

चीन का भी मानना है कि हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा देने वाले नेहरू की अदूरदर्शिता इस युद्ध की वजह रही। दरअसल नए चीन की स्थापना के बाद उस पर मैकमोहन रेखा को स्वीकार करने के लिए दबाव डाला जा रहा था, जबकि यह रेखा उसकी सहमति के बिना ही खींची गई थी। 1962 से पहले मैकमोहन रेखा के कुछ उत्तरी इलाकों में चीनी सेना का कब्ज़ा था। जब इस क्षेत्र में भारत ने चीनी सैनिकों पर आक्रमण किया, तो चीन ने इसे गंभीर हमला मानते हुए कार्रवाई की।

युद्ध में भारत को पटखनी देने के बाद चीनी सेना एकतरफा युद्ध विराम का ऐलान कर पुराने क्षेत्र में वापस लौट गई। हालांकि इसके पीछे तत्कालीन सोवियत संघ, अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा भारत को सैन्य मदद देने की तैयारी भी एक वजह थी। चीन आज भी सैन्य शक्ति के मामले में भारत से बहुत आगे है। चीन की सैन्य ताकत को भारत के साथ-साथ पश्चिमी देश भी खतरे के तौर पर देखते हैं। चीन के रक्षा बजट पर भी सवाल उठते हैं। जबकि अमेरिका की तुलना में चीन का रक्षा खर्च बहुत कम है।

जहां तक चीन में भारतीयों के प्रति नजरिया का मामला है, तो यहां भारत-विरोध जैसी कोई भावना नहीं है। भारत के बारे में चर्चा करने पर लोग योग, बौद्ध धर्म, बॉलीवुड फिल्मों और संगीत का जिक्र करने लगते हैं। हाल के दिनों में बॉलीवुड की थ्री इडियट्स यहां बहुत लोकप्रिय हुई है। पचास साल पहले का युद्ध भी आम चीनियों के लिए अब कोई मुद्दा नहीं है। उनका कहना है कि अब हमें आगे की ओर देखना चाहिए।

उनके दिल में भारतीयों के लिए शत्रुता नहीं है, क्योंकि भारत के साथ विवाद ऐसा है, जिसे सुलझाया जा सकता है। रिसर्च ऐंड फाउंडेशन ऑफ इंटरनेशनल इश्यू इन चायना के प्रमुख वांग यूशंग कहते हैं कि चीन और भारत के संबंध बेहतर हो सकते हैं। पर अमेरिका इस क्षेत्र में अपने हित साधने के लिए दोनों देशों को आपस में बांटे रखना चाहता है, ऐसे में संघर्ष से किसी को लाभ नहीं पहुंचेगा।

भाषा विशेषज्ञ जानकी वल्लभ कहते हैं कि भारत और चीन के संबंध बहुत पुराने रहे हैं और पचास साल पहले के युद्ध से इस रिश्ते पर कोई बहुत बड़ा असर नहीं पड़ा है। चीन के सुदूर गांवों में जाने पर आज भी भारत और भारतीयों के प्रति मैत्री का भाव दिखाई देता है। और इसका असर बहुत गहरा है। गांव में चले जाइए, लोग भारत के प्रति मैत्री का भाव रखते हैं। यहां तक कि 1962 के युद्ध के बाद भी चीन में भारत- विरोधी भावना उस तरह नहीं दिखी। हालांकि पिछले दिनों कुछ भारतीय व्यापारियों के साथ हुए गलत व्यवहार से ऐसी धारणा बनी थी। फिर बीजिंग की वीजा नीति भी कई बार भारत-विरोधी दिखती है। लेकिन जमीनी धरातल पर ऐसा कुछ नहीं है।

युद्ध के पचास साल के अवसर पर कुछ चीनी बुद्धिजीवी स्वीकार करते हैं कि यदि चीन ने भी थोड़ा संयम बरता होता, तो इस युद्ध को टाला जा सकता था, क्योंकि युद्ध के बाद भी सीमा विवाद जस का तस है, जबकि इस पर लगभग चौदह दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं। अरुणाचल प्रदेश, जिसे चीन दक्षिण तिब्बत कहता है, अक्साई चिन, दलाई लामा और तिब्बत आदि को लेकर दोनों के बीच का विवाद भी कायम है।

उल्लेखनीय है कि भारत आज भले ही चीन को प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानता है, मगर चीन के लिए जापान और अमेरिका का महत्व कहीं अधिक है, ऐसे में उसका ध्यान विशेष तौर पर भारत की ओर नहीं है। भारत-चीन युद्ध की 50वीं वर्षगांठ पर भी जहां भारतीय मीडिया में तमाम खबरें आ रही हैं, वहीं चीन में इस मुद्दे को तवज्जो नहीं दी गई है। सिर्फ एक अखबार ने भारतीय मीडिया की टिप्पणी का हवाला देकर चीन की आर्थिक शक्ति का उल्लेख करते हुए लिखा है कि पिछले पचास वर्षों में चीन की सैन्य शक्ति निश्चित रूप से भारत से बेहतर है। न केवल सैन्य क्षेत्र में, बल्कि आर्थिक क्षेत्र में भी चीन ने इस दौरान उल्लेखनीय प्रगति की है।
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