आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

राजस्थान

एक फिल्म का पूरा होना

कुमार प्रशांत

Updated Tue, 23 Oct 2012 08:16 PM IST
article-of-24-oct of Kumar Prashant on yash chopara
जैसा किसी ने सोचा नहीं था और जिसकी कहीं से आशंका भी नहीं थी, वैसा ही हुआ और यश चोपड़ा ने विदाई ले ली। अपने 80वें जन्मदिन के विशेष आयोजन में और फिर अमिताभ बच्चन के 70वें जन्मदिन के आयोजन में वह जिस तरह दिखाई दिए थे, उससे किसे लगा होगा कि अंगुलियों पर गिनने जितनी ही दूर खड़ी मौत यशजी को उठाने की तैयारी में है! और जाने का कारण भी कैसा? डेंगू!...
यश चोपड़ा नहीं रहे! हमारे लिए इसके कई मतलब होते हैं। उनकी फिल्में उस श्रेणी की कदापि नहीं थीं, जिस श्रेणी की फिल्में हमें सत्यजित रे के यहां मिलती हैं। वे उस श्रेणी के फिल्मकार भी नहीं थे, जिस श्रेणी में हम श्याम बेनेगल की शुरुआती फिल्में रख सकते हैं। यश चोपड़ा कभी भी जाने भी दो यारो या ब्लैक या तारें जमीन पर नहीं बना सकते थे। फिर यश चोपड़ा के नहीं रहने से क्या है, जो मुंबइया फिल्मों में अब बमुश्किल मिलेगा?

हम उनकी किसी भी फिल्म को देखने बैठ जाएं, जवाब मिल जाएगा! सभी लिख या कह रहे हैं कि वह रोमांस के बादशाह थे। थे, लेकिन वह करण जौहर नहीं थे और न करण जौहर चाहकर भी कभी दीवार बना सकते हैं या फिर लम्हे! यह यशजी व करण की तुलना नहीं है, बल्कि फिल्मों की तरफ देखने के दो नजरियों को समझने की कोशिश है।
 
यश चोपड़ा जैसी किस्सागोई आसानी से नहीं मिलती है। यह कमी बहुत खलेगी। उनकी कहानी में दौलतमंद लोग होते थे, सौंदर्य भी होता था और वैभव भी। दुनियावी संकटों से जूझते आम इनसानों की कहानी खोजने आप यश चोपड़ा के पास जाएंगे, तो निराश भी होंगे और शायद नाराज भी! लेकिन इस सबको पार कर, मनुष्य की मानसिक उलझनों, प्यार पाने व देने के उद्रेक, परिस्थितियों में फंस कर उसकी तड़प तक आप पहुंचना चाहें, तो यश चोपड़ा इसमें आपकी मदद करते हैं।

हम देखते हैं कि वह अपने वक्त के सितारों के साथ ही काम करते थे और जल्दी से अपनी पसंदगी बदलते नहीं थे, इसलिए राजेंद्र कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान को आप किनारे कर दें, तो यश चोपड़ा के विकास की कहानी का रास्ता ही खो जाएगा। इसलिए स्टारडम की बैसाखी उन्होंने कभी छोड़ी नहीं, लेकिन स्टारों की चमक-दमक में यश चोपड़ा खो जाएं, यह भी नहीं हुआ। सितारों के साथ सितारा बनकर काम करना यह यश चोपड़ा का ठस्सा था।

1959 में उनकी बनाई पहली फिल्म धूल का फूल भी सितारों से सजी थी, लेकिन उस पहली कोशिश से ही उनमें यह सावधानी भी दिखाई देने लगी कि फिल्म बनाने का मतलब है, इस उलझन को सुलझाना कि किसी-न-किसी सवाल को कहानी से पिरोकर कैसे लोगों तक पहुंचाया जाए! वक्त, दाग, इत्तेफाक जैसी फिल्मों में यश चोपड़ा इसी को खोजते और इस पर अपना हाथ मांजते दिखाई देते हैं। अगर ये फिल्में पिट जातीं, तो यश चोपड़ा का सफर इतना लंबा नहीं हुआ होता।

1975 में दीवार बनी और इसके साथ ही बहुत कुछ बना! अमिताभ बच्चन बने और यश चोपड़ा मार्का फिल्मों की चौहद्दी भी तय हुई। यह चौहद्दी क्या थी? मजबूत कहानी, नामी सितारों को चुनौती देते किरदार, भव्यता के साथ फिल्मांकन, पर यह सावधानी भी कि जो कहानी है, वह इन सबमें खो न जाए! अमिताभ बच्चन भी यदि कभी वक्त निकालकर हिसाब लगाएंगे, तो यह समझ पाएंगे कि दीवार, कभी-कभी, त्रिशूल, काला पत्थर और सिलसिला देखने के बाद उनका कुछ भी देखना बाकी नहीं रहता है।


हम यह भी देख सकते हैं कि अपनी फिल्मों की सफलता के साथ-साथ यश चोपड़ा असुरक्षा से घिरते नहीं गए। मुंबइया फिल्मी भाषा में, जिसे फॉरमूला कहते हैं, वैसा कुछ यशजी को बांध नहीं पाया। अपनी हर सफल फिल्म के साथ उनका भी विकास होता गया। वह अपनी तरह की फिल्मों में नई जमीन तोड़ने की तरफ बढ़ते रहे। चांदनी बड़े प्यार से बनाई हुई, बड़ी प्यारी फिल्म थी- वक्त की तरह! पर इसके बाद ही यशजी लम्हे के साथ सामने आए। दोनों फिल्में दो छोर पर खड़ी हैं। लम्हे जैसी फिल्म दूसरा कौन बना सकता था! 

लम्हे के बाद ही शुरू होता है, यश चोपड़ा और शाहरुख खान का साथ! मुझे याद आती है तीन फिल्में- डर, दिल तो पागल है और वीर-जारा! बहुत ही भिन्न धरातल पर तीनों फिल्में काम करती हैं और यश चोपड़ा अपनी काव्यात्मकता का शिखर छू लेते हैं। इन तीन फिल्मों को छोड़ दें, तो शाहरुख भी धूल ही समेटते रह जाएंगे! प्यार की उन्मुक्तता, उसकी दीवानगी, उसका पारे-सा स्वभाव और उसकी गहरी, दर्द में डूबी, नसों में दौड़ती अमरता- सबको किसी महाकाव्य-सी विराटता में यश जी ने पकड़ा भी है और साकार भी किया है।

वह जो नहीं थे, उसे इन फिल्मों में खोजने की कोशिश हम करेंगे, तो गलत करेंगे। वह जो थे, उसे कितने परिष्कार से वह आंक सके हैं, यह देखेंगे तो, अभिभूत रह जाएंगे। कोई छिछोरापन नहीं, कोई नंगई नहीं, सस्ते गानों की, वह छौंक नहीं, जिन्हें इन दिनों आइटम सांग कहकर बेचा जा रहा है।  

यश चोपड़ा के जाने के साथ यह सारा कुछ ठिठक गया है- कम-से-कम हिंदी फिल्मों की दुनिया में तो एक सन्नाटा घिर ही गया है। यह सन्नाटा अब टूटेगा नहीं, ऐसा कहना तो कला की सीमा बांधना होगा, लेकिन यह कहना जरूरी है कि यश चोपड़ा जैसी संपूर्णता और दीवानगी के बिना यह संभव नहीं होगा...
  • कैसा लगा
Write a Comment | View Comments

स्पॉटलाइट

ऋतिक की पार्टी में पहुंची एक्स वाइफ सुजैन, 'काबिल' देखकर पति को भर लिया बाहों में

  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

हर लड़के के लिए ये 6 काम है जरूरी, तभी खुश रहेगी गर्लफ्रेंड

  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

काबिल ऋतिक की 8 नाकाबिल फिल्में, हो गई थी फ्लॉप

  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

अमिताभ नहीं अब ये हीरो करेगा 'केबीसी' को होस्ट

  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

वीवो का V5 प्लस भारत में लॉन्च, फ्रंट में लगे हैं दो कैमरे

  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

Most Read

न्याय चाहिए, मुआवजा नहीं

Want justice, not compensation
  • गुरुवार, 19 जनवरी 2017
  • +

अर्द्धसैनिक बल और सेना में फर्क

difference in Paramilitary forces and the army
  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

बजट में दिखेंगे नोटबंदी के फायदे

Advantage of Demonitisation will show in Budget
  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

चीन की बराबरी के लिए सुधार जरूरी

Reforms is must for china equipollence
  • रविवार, 22 जनवरी 2017
  • +

यह कैसी आचार संहिता है

What type of this Code of Conduct
  • रविवार, 22 जनवरी 2017
  • +

चुनाव सुधार के रास्ते के रोड़े

Hurdel of Election reforms
  • बुधवार, 18 जनवरी 2017
  • +
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!
Top