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अमिताभ बच्चन फिर से...

रशीद किदवई

Updated Mon, 06 Nov 2017 07:04 PM IST
Amitabh Bachchan again ...

अमिताभ बच्चन

एक ऐसे देश में जहां क्रिकेट और फिल्म जगत की हस्तियों-विराट कोहली, प्रियंका चोपड़ा, कंगना रनौत, ऋतिक रोशन, सचिन तेंदूलकर, सानिया मिर्जा और शाहरुख की जिंदगी पर बारीक नजर रखी जाती है, पनामा पेपर्स के बाद पैराडाइज पेपर्स में अमिताभ बच्चन के नाम ने खासी दिलचस्पी पैदा की है। यह खुलासा करने वाले अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति के पहले सत्र के एक वर्ष बाद वह 2002 में बरमुडा की एक डिजिटल मीडिया कंपनी के अंशधारक बने थे। उस वक्त के कानूनी प्रावधानों के मुताबिक, किसी भी भारतीय द्वारा विदेश में किए जाने वाले निवेश के लिए रिजर्व बैंक की पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य था।
अमिताभ इसे लेकर अभी कांग्रेस पार्टी के निशाने पर हैं, 1985-87 में जिसका उन्होंने लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया था। उस वक्त वह राजीव गांधी के करीबी थे, लेकिन बोफोर्स मामले में नाम सामने आने के बाद उन्होंने खुद को राजनीति से अलग कर लिया था। दिलचस्प है कि सोमवार की मध्य रात्रि से थोड़ा पहले पैराडाइज पेपर्स से संबंधित खुलासे से थोड़ा पहले ही, अमिताभ ने अपने ब्लॉग में लिखा था कि उन्हें प्रसिद्धि से मुक्ति और शांति चाहिए। क्या उन्हें पता था कि उनसे जुड़ी कुछ चीज सामने आने वाली है? 75 वर्षीय बच्चन ने लिखा, इस उम्र में मैं लोकप्रियता से इतर कुछ शांति और एकांत चाहता हूं...अपनी जिंदगी के आखिरी वर्षों में मैं अपने तक केंद्रित रहना चाहता हूं...मुझे कोई उपाधि नहीं चाहिए, मुझे इससे जुगुप्सा हो गई है...मुझे सुर्खियां नहीं चाहिए, मैं इसका हकदार नहीं हूं/...मुझे किसी तरह की मान्यता नहीं चाहिए...।'

अमिताभ हमेशा से यह जतलाने की कोशिश करते रहे हैं कि वह अराजनीतिक हैं। लेकिन अमिताभ की जिंदगी को करीब से देखें, तो पता चलता है कि नियति उन्हें हमेशा राजनीति और राजनेताओं के करीब ले गई। देखा जा सकता है कि सोनिया गांधी सहित कांग्रेस के अनेक नेता और कभी उनके करीबी मित्र रहे अमर सिंह प्रधानमंत्री मोदी से उनकी करीबी के कारण उनसे क्षुब्ध रहते हैं। दूसरी ओर बच्चन परिवार की नेहरू-गांधी परिवार से भी लंबी दोस्ती रही, जिसकी शुरुआत बरसों पहले इलाहाबाद में आनंद भवन से शुरू हुई थी। उस वक्त इंदिरा अविवाहित थीं और सरोजनी नायडु ने अमिताभ के पिता और प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन तथा उनकी सिख पत्नी तेजी बच्चन का परिचय जवाहर लाल नेहरू और उनकी बेटी से यह कहते हुए कराया था, कि 'ये हैं कवि और उनकी कविता!' अमिताभ तब चार वर्ष के थे, जब उनका परिचय दो वर्षीय राजीव से हुआ था। बच्चन परिवार के इलाहाबाद स्थित आवास पर एक फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता हुई थी, जिसमें राजीव स्वतंत्रता सेनानी बने थे।

बॉलीवुड में अमिताभ को पहला मौका ख्वाज अहमद अब्बास ने गोवा की मुक्ति पर बनी फिल्म सात हिंदुस्तानी में दिया था। अब्बास को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा का करीबी समझा जाता था और उस वक्त लोग कहते थे कि उन्हीं की वजह से अमिताभ को काम मिला। हालांकि अब्बास ने इससे इन्कार किया था। बरसों बाद जब अमिताभ अभिनेता बन गए, तब राजीव उनके सेट पर भी जाया करते थे। 
अमिताभ ने राजीव के बारे में एक बार कहा था, 'उनकी प्रकृति ऐसी है कि वह अपने परिवार का नाम कभी बदनाम नहीं करेंगे। वह अक्सर इस भय से अपना उपनाम भी नहीं बताते कि कहीं किसी साधारण व्यक्ति से उनकी दूरी न बन जाए।' फिर आपातकाल का दौर भी आया। अक्सर संजय गांधी के साथ दिखने की वजह से अमिताभ को मीडिया की आलोचना का भी सामना करना पड़ा। 11 अप्रैल, 1976 को दिल्ली में संजय गांधी और रुखसाना सुलताना (फिल्म अभिनेत्री अमृता सिंह की मां) द्वारा प्रचारित विवादास्पद परिवार नियोजन कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए एक संगीत कार्यक्रम गीतों भरी शाम आयोजित किया गया था। इसमें अमिताभ और जया, दोनों मौजूद थे। आपातकाल के दौरान अमिताभ ने आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा किशोर कुमार पर प्रतिबंध लगाने और उस वक्त की सरकार के आलोचक देव आनंद और प्राण के बहिष्कार पर कभी कुछ नहीं कहा। हवाई हादसे में संजय की मौत के बाद जब राजीव राजनीति में आए तो अमिताभ ने 1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों के उद्घाटन कार्यक्रम में अपनी आवाज दी थी। अमिताभ कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे और राजीव इसके मुख्य आयोजक थे।

बोफोर्स घोटाला सामने आने के बाद अमिताभ ने, जो उस समय इलाहाबाद से सांसद थे, खुद को राजनीति से अलग कर लिया। उन पर दलाली के आरोल लगे। महानायक ने अपने सम्मान के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी और जीते भी, पर राजनीति से उनका जुड़ाव खत्म हो गया। यह कहा जा सकता है कि गांधी परिवार से अमिताभ के अलग होने का असर 1987 में इलाहाबाद लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव पर पड़ा, जब विपक्ष ने इसे अवसर की तरह देखा कि वह 413 सीटें जीतने वाली कांग्रेस को पराजित कर सकता है।

अमिताभ की राजनीतिक गाथा में अगस्त, 1996 में तब एक और कड़ी जुड़ी, जब दो अति विशिष्ट व्यक्ति प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा और शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे उनके बंगले पर पहुंचे थे। इसके बाद अनेक आर्थिक झटकों ने अमिताभ को अमर सिंह और सहारा समूह के प्रमुख सुब्रतो राय के करीब ला दिया। मुलायम सिंह से अमर सिंह की दूरी बढ़ने का असर अमिताभ पर भी पड़ा। फिर वह नरेंद्र मोदी के करीब आ गए।

वर्ष 2015 में अर्णव गोस्वामी को दिए एक इंटरव्यू में अमिताभ ने कहा था कि उन्हें पता नहीं था कि महाराष्ट्र में बीफ पर प्रतिबंध है। इसके तुरंत बाद उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई कानून पारित हुआ है, तो उसका पालन होना चाहिए। दिल्ली और मुंबई मेंे कई ऐसे पुराने लोग मिल जाएंगे, जो यह बताएंगे कि यह अमिताभ का खुद को विवादों से दूर रखने और अपने प्रशंसकों की नाराजगी टालने का तरीका है।
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