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अफगानिस्तान में उलझ गया अमेरिका

कुलदीप तलवार

Updated Tue, 25 Dec 2012 09:05 PM IST
america became entangled in afghanistan
अफगानिस्तान में जारी अमेरिका की सबसे बड़ी लड़ाई 12वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। अमेरिकी नेतृत्व वाली नाटो सेना ने सात अक्तूबर, 2001 से अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के खिलाफ जंग शुरू की थी, लेकिन इसका अभी तक खात्मा नहीं हुआ। बेशक इस दौरान पश्चिम समर्थित राष्ट्रपति हामिद करजई की सरकार तो बची रही, लेकिन 50 देशों की नाटो सेना के 1,30,000 सैनिकों की मौजूदगी के बावजूद, तालिबान मजबूत हुए हैं। आधे से ज्यादा अफगानिस्तान में तालिबान का वर्चस्व कायम है।
गत वर्ष शिकागो में नाटो के शिखर सम्मेलन में 2013 के मध्य से अफगान की सुरक्षा की जिम्मेदारी अफगान बलों को सौंपने, 2014 के अंत तक नाटो की फौज को अफगानिस्तान से हटाए जाने और वहां प्रशिक्षण के लिए चंद वर्षों के लिए कुछ सैनिकों को रखने पर सहमति बनी थी। अब जैसे-जैसे अफगानिस्तान से निकलने का समय निकट आता जा रहा है, अमेरिका की बेचेनी बढ़ती जा रही है।

सैनिकों को निर्धारित समय के अंदर निकालने के लिए वह प्रयत्नशील है, पर उसे निकलने के लिए सुरक्षित रास्ता नहीं मिल रहा। दूसरा, अफगानिस्तान के हालात भी इस बात की इजाजत नहीं देते कि नाटो फौज अभी वहां से निकलें। दूसरी तरफ अमेरिका अब तालिबान को शांति समझौते के लिए मजबूर करने पर जोर नहीं दे रहा। शायद उसकी नजर में अच्छे और बुरे तालिबान का अंतर खत्म हो गया है। अब वह पाक-अफगानिस्तान में व्यापक संवाद देखना चाहता है।
 
इधर यह भी देखने में आया है कि पाक सरकार बराबर कह रही है कि अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए हर संभव सहयोग करने के लिए वह तैयार है, क्योंकि जब तक अफगानिस्तान में अमन व स्थायित्व कायम नहीं होता, तब तक पाकिस्तान में भी शांति कायम नहीं होगी। लेकिन पाक फौज के मुखिया जनरल कियानी ने चंद दिन पहले आयोजित सुरक्षा परिषद की बैठक में यह शर्त जोड़ दी कि पाक का सहयोग तभी संभव है, जब उसके हितों को कोई नुकसान नहीं पहुंचे। दुनिया जानती है कि आईएसआई एक मजबूत ताकत है और पाक-तालिबान की चाबी उसके हाथ में है।

जब तक आईएसआई पाक-तालिबान को परदे के पीछे दी जा रही मदद व समर्थन देना बंद नहीं करती, तब तक पाक-तालिबान किसी भी सूरत में शांति वार्ता के लिए तैयार नहीं होंगे। सच तो यह है कि आईएसआई पाक-तालिबान को काबुल की सत्ता पर कब्जा करवा कर पहले की तरह पाक की ही एक कठपुतली सरकार कायम करना चाहती है। अफगानिस्तान के खनिज संसाधनों पर भी पाक की नजर है। पाक फौज यह भी जानती है कि अफगानिस्तान में 2014 में राष्ट्रपति का चुनाव होना है और करजई वहां के संविधान के अनुसार तीसरी बार चुनाव नहीं लड़ सकते। इसलिए उनका जाना तय है। ऐसे में तालिबान का सत्ता पर कब्जा जमाना आसान हो जाएगा।

वहीं अमेरिका चाहता है कि अफगानिस्तान को इतना सक्षम बनाया जाए कि नाटो फौज के वहां से निकलने के बाद वह एक मजबूत पोजिशन ले ले। अमेरिका अफगानी फौज के 3,52,000 सैनिकों को गुणवत्ता की दृष्टि से सक्षम बनाने की कोशिश में लगा हुआ है। वैसे अभी तक अफगान फौज इसके लिए पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं हो पाई। वैसे भी करजई की भ्रष्ट सरकार प्रशासन के मामले में बहुत कमजोर है। इसलिए आम ख्याल यह है कि नाटो फौज के निकलने के बाद अफगान सेना सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं उठा पाएगी।

आशंका जताई जा रही है कि तब अफगानिस्तान में गृहयुद्ध की शुरुआत होगी। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, काबुल में 2014-2015 में अराजकता और हिंसा का वर्चस्व होगा। इतिहास गवाह कि जब-जब विदेशी शक्तियों ने अफगानिस्तान को उसके हाल पर छोड़ा, वहां के कबाइली नेता आपस में लड़ते रहे। इसलिए अगर अमेरिका अफगानिस्तान को अधर में लटका छोड़कर वहां से फरार होगा, तो निस्संदेह अफगानिस्तान की गरीब जनता की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। इसका प्रतिकूल असर भारत पर भी पड़ेगा। लिहाजा अब देखना यह है कि आगे अफगानिस्तान के हालात क्या शक्ल अख्तियार करते हैं।

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