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फिर दोराहे पर कांग्रेस

मृणाल पाण्डे

Updated Fri, 14 Sep 2012 04:30 PM IST
again congress on dual path
और अब खबर आ रही है कि राष्ट्रपति चुनावों के बाद राहुल गांधी सामने आकर पार्टी या सरकार में कोई अपेक्षित ‘बड़ी’ जिम्मेदारी संभालेंगे। लोकतांत्रिक राजनीति में वंशवाद की सराहना बेशक काबिल-ए-तारीफ नहीं, फिर भी कांग्रेस के साथ देश के लगभग सभी छोटे- बड़े, राष्ट्रीय-क्षेत्रीय दलों के लिए वंशाधारित सत्तानुक्रम अपना वजूद कायम रखने की एक बुनियादी शर्त बन गया है। बेचारे सलमान खुर्शीद की नाहक मलामत हुई कि उन्होंने राहुल गांधी को आगे आकर कांग्रेस की बागडोर थामने और दिशाहीन होती पार्टी को राह दिखाने की बात छेड़ी। यह तो काफी दिनों से कई सारे कांग्रेसी अपने मीडिया मित्रों से निजी मुलाकातों में कहते रहे हैं।
अब जहां तक नेतृत्व के लिए जरूरी जानकारी या मिली जुली सरकार चलाने के गहरे अनुभव का सवाल है, इस जटिल नाटक की स्क्रिप्ट को संप्रग के जिन गिने चुने लोगों ने लगातार अंतिम शक्ल दी है, उनमें राहुल गांधी अनिवार्यत: शामिल रहे हैं। शंका है तो इसको लेकर कि राहुल के असली सोच या कामकाज की शैली की बाबत देश को जो जानकारी है, वह सेकंड हैंड किस्म की है। बरसों से उनके गिर्द हर पल मौजूद सुरक्षा वलय और कुछेक उम्रदराज सलाहकारों की ‘दूर हटो ऐ दुनियावालो!’

शैली ने उनके गिर्द एक कुहासा रच रखा है। इसलिए जब-जब महिलाओं, दलितों या आदिवासियों पर हुए किसी अत्याचार के विरोध में राहुल गांवों में जाकर दलित झोपड़ी में सुस्ताते दिखे भी, तो सुरक्षा घेरे और फूलमालायें पहनानेवालों के प्रायोजित हुजूम से दूर रखे गए आम मतदाता को अकसर वह अपने से बहुत दूर किसी और ही लोक के मिथकीय नायक और उनके कार्यकलाप एक किस्म की नयनाभिराम लीला ही प्रतीत हुए। चुनावी सभाओं में भी उनको सुनने भारी तादाद में उमड़े मतदाता युवा नेता को देख सुनकर दृढ़ भरोसे या जुनूनी आस से भरने के बजाय भोले विस्मय, कौतुक और सराहना से उनकी राजनीति में रहते हुए भी विदेह जनक वाली छवि को निहार कर लौटते रहे हैं।

राजीव गांधी के शासन काल तक सोनिया ने अपने बच्चों को जान-बूझकर पृष्ठभूमि में रखा। राजनीति में खुद सोनिया का अवतरण भी अकस्मात् और बाध्यता के तहत ही हुआ, अतः शुरुआती दिनों में आगे बढ़कर अपना महत्व जताने से उन्होंने हरचंद परहेज किया। पर धीमे-धीमे उनके नेतृत्व में पार्टी की सुधरती दशा- दिशा ने उनकी एक सदय, गंभीर नेतृत्व देनेवाली गरिमामय महिला नेता की छवि बना दी है। राहुल गांधी भी इसी प्रक्रिया के शुरुआती दौर से गुजर रहे हैं। शायद इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की एक के बाद एक अकालमृत्यु से कांग्रेस में भीषण अफरातफरी न मची होती, तो संभव है, यह समय आने तक राहुल स्वतंत्र ऊंचाइयों को छू चुके होते। लेकिन जो नहीं हुआ, सो नहीं हुआ।

सच यही है कि अब कांग्रेस एक बार फिर उनकी निजी इच्छा-अनिच्छा की परवाह किए बिना उम्मीद लगाए हुए है कि 2014 चुनाव के लिए वह प्रधानमंत्री पद के सर्वमान्य उम्मीदवार बनकर ‘गरीबी मिटाओ’ या ‘सबके लिए रोजगार’ सरीखा कोई जिताऊ और नई पीढ़ी को खींचनेवाला नया ताकतवर मंत्र देंगे। भारतीय मतदाता यही मांग करते हैं कि उनका दुलारा नेता करिश्माती कल्पनाशीलता से उसे ऐसी भव्यता से पेश करे, कि मामूलीराम के दिल से भी बेसाख्ता, भई वाह! निकल आए। नेहरू की जनसभाओं या जेपी या अन्ना की रैलियों की फुटेज देख लीजिए, बात स्पष्ट हो जाएगी।

राहुल गांधी को एक भारतीय शैली का लोकप्रिय जननेता और डेढ़ सौ बरस पुरानी पार्टी का चुनावी मार्गदर्शक बनना है, तो उनको दो बातों को छोड़ना होगा। एक : आम राय में वह कई बार अपनी मां की परछाईं और प्रतिध्वनि नजर आते हैं। मातृभक्ति भारत में सराहनीय बात है, लेकिन अपने यहां शायर, सिंह और सपूत की परख लीक से हटकर चलने की क्षमता से ही होती है। याद करें कि राहुल के परनाना जवाहरलाल ने अपने प्रिय पिता से वैचारिक टक्कर ही नहीं ली, अंतत: उनको भी अपने विलायती कपड़ों की होली जलाने को बाध्य कर खादीधारी कांग्रेसी बना दिया।

इंदिरा ने भी सत्ता में आते ही पुरानी कांग्रेस को दो फाड़ कर नई चाल में ढाला जिससे जनता खुश ही हुई। दो : राहुल अब तक राजनीति के कई तूफानों के साक्षी भले रहे हों, लेकिन उनका रुख कमोबेश एक खामोश वैज्ञानिक तटस्थता का ही रहा है। राहुल को अब राष्ट्रीय राजनीति की उफनाती धार में कूदकर कुछेक तूफानों के नागफण पर नाचना और उनको नाथकर दिखाना होगा, क्योंकि जनता अब 2014 में होने जा रही प्रधानमंत्रित्व की बाधा दौड़ के लिए राजग के मोदी से उनकी स्पर्द्धा तय मान रही है।

भारतीय इतिहास के संदर्भ में देखें, तो अब तक पत्ते न खोलने के बावजूद राहुल नरेंद्र मोदी की तुलना में भारतीय जनता के अधिक बड़े भाग के लिए स्वीकार्य नेता हैं। मोदी कुशल शासक तो हैं, लेकिन हुकूमत को लेकर उनका दृष्टिकोण एक कठोर पुलिसिया दृष्टिकोण रहा है। उन्होंने वाघेला या केशुभाई या संजय जोशी सरीखे वरिष्ठ नेताओं को जिस तरह हटवाया, वह तरीका भी शालीन नहीं कहा जाएगा। गोधरा दंगों पर माफी न मांगने को लेकर उनकी जिद भी कायम है। वह प्रधानमंत्री बन गए, तो इस नाजुक मुद्दे पर लगातार उनकी सरकार पर खतरा घिरा रहेगा।

संभव है कि तब उनका दृष्टिकोण शायद कुछ हद तक बदले, लेकिन मूल बात यह है कि उनके व्यक्तित्व में तमाम डिजाइनर परिधान पहनने के बाद भी एक प्रौढ़ कुंवारे की आक्रामक कर्कशता अधिक है, वाजपेयी जी सरीखी सहज शालीनता या उदारता बहुत कम। हमारे यहां जनता ने बेहतरीन शासक उनको ही मानकर भरपूर प्यार दिया, जो हर वर्ग जाति धर्म के प्रति उदारहृदय, विनम्र और सहिष्णु रहे।

इस परंपरा को सही तरह निभाने को राहुल गांधी के लिए भी जरूरी होगा कि वह खामोश क्रोध से उफनते या सत्ता के प्रति विरक्त युवा की छवि से उबरें और एक युवा की सहज हंसमुख आक्रामकता के साथ सही लगें, तो पार्टी के फैसलों को शक्ल दें और गलत लगें तो खमठोक चुनौती देने से झिझकें नहीं। तभी हर जाति, धर्म, वर्ग और लिंग के युवाओं की कर्मठ और सही मायनों मे उदार वैज्ञानिक नजरिये वाली पीढ़ी उनके गिर्द जुटने में रुचि लेगी।
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