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धन-संपत्ति का क्यों हो मोह

Yashwant Vyas

Updated Mon, 10 Sep 2012 12:00 PM IST
धर्मग्रंथों में बताया गया है कि जितनी जरूरत हो, उससे अधिक धन का संग्रह नहीं करना चाहिए। कहा भी गया है कि साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। इसलिए संपत्ति का मोह त्यागकर परोपकार में ही हमेशा रत रहना चाहिए।
सेठ दुनीचंद लाहौर के बड़े व्यापारी थे। अपनी करोड़ों की संपत्ति उन्हें प्राणों से अधिक प्यारी थी। वह प्रायः कहा करते थे, बिना धन के लोक-परलोक में कहीं भी आदमी की पूछ नहीं होती। एक दिन दुनीचंद गुरु नानकदेव के दर्शन को पहुंचे। नानक जी को उनके शिष्य ने संपत्ति के प्रति दुनीचंद के मोह की बात बता दी। नानकदेव ने दुनीचंद से पूछा, सेठ कुछ परोपकार और सेवा में भी खर्च करते हो क्या?

महाराज, मेरा बड़ा परिवार है। उसी के लिए मुझे अभी और धन चाहिए। संपत्ति और धन के बिना लोक-परलोक का काम कैसे चलेगा? दुनीचंद ने उत्तर दिया।

गुरु जी ने अपनी जेब से एक सुई निकाली, उसे दुनीचंद को देते हुए कहा, सेठ इसे अपने पास रख लो। मरने के बाद मुझे स्वर्ग में लौटा देना।

सेठ ने जवाब दिया, गुरु जी, मरते समय मैं इस सुई को अपने साथ कैसे ले जा सकता हूं? कोई भी वस्तु मरने के बाद कहीं साथ जाती है? यह सुनकर गुरु नानक बोले, फिर सेठ, तुम इस अपार संपत्ति को अपने साथ परलोक कैसे ले जाओगे? और उसी समय सेठ दुनीचंद की आंखें खुल गईं। उन्होंने अपनी संपत्ति का परोपकार के कामों में सदुपयोग शुरू कर दिया।
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