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भगवद् चिंतन और राष्ट्र भक्ति

Yashwant Vyas

Updated Fri, 31 Aug 2012 12:00 PM IST
दैनिक जीवन में कभी-कभी साधारण प्रसंग भी हमें इतना चमत्कृत कर जाता है कि हम खुद-ब-खुद ईश्वर भक्ति की ओर उन्मुख हो जाते हैं। ऐसी ही घटना एक बार स्वामी रामतीर्थ के साथ हुई। वह पानी के जहाज से जापान जा रहे थे। उनके साथ एक वृद्ध अमेरिकी भी यात्रा कर रहे थे। स्वामी जी का उससे घनिष्ठ परिचय हो गया। स्वामी जी ने देखा कि वह घंटों तक रूसी भाषा सीखने का अभ्यास करते रहते हैं। स्वामी जी ने पूछा, आप भूगर्भ शास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं, सत्तर वर्ष की आयु हो चुकी है। आप ग्यारह भाषाओं के ज्ञाता हैं। अब आपके जीवन का सांध्यकाल है। भगवद् चिंतन करने की जगह बारहवीं भाषा सीखकर समय व्यर्थ क्यों कर रहे हैं?
उस अमेरिकी ने उत्तर दिया, स्वामी जी, हाल ही में रूसी भाषा में भूगर्भ शास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हुआ है। मेरी अभिलाषा है कि उसका अंगरेजी भाषा में अनुवाद कर उसे अपने देश के छात्रों को उपलब्ध कराऊं। इस ज्ञान से मेरे राष्ट्र को भी लाभ पहुंचेगा। इसलिए रूसी भाषा सीख रहा हूं।

कुछ क्षण रुककर उसने फिर कहा, स्वामी जी, जहां तक भगवद् चिंतन और उपासना का प्रश्न है, मैंने गीता से यह प्रेरणा ली है कि ज्ञान की साधना तथा राष्ट्र का हित चिंतन भगवान की उपासना का ही एक रूप है। मैं इसी साधना को भगवान की उपासना मानता हूं। स्वामी रामतीर्थ उस वृद्ध के मुख से भगवान की उपासना की अनूठी व्याख्या सुनकर गद्गद हो उठे।
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