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गुरु-दक्षिणा का सही वक्त

Yashwant Vyas

Updated Fri, 03 Aug 2012 12:00 PM IST
नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि वक्त पर किया गया काम न सिर्फ उस काम की सार्थकता बढ़ाता है, बल्कि नए इतिहास के सृजन की ओर भी उन्मुख करता है। इसी से जुड़ा से प्रसंग उज्जैन के सांदीपनि ऋषि का है, जिनके आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण विद्याध्ययन करते थे। वह चरणों में बैठकर मुनिश्री से ज्ञान प्राप्त किया करते थे। वह सुदामा तथा अन्य सहपाठियों के साथ गुरुकुल की सफाई करते। गोशाला की गायों को हरी-हरी घास खिलाते। रात्रि को जब गुरुजी सोने लगते, तो उनके चरण दबाते।
शिक्षा पूरी कर लेने के बाद श्रीकृष्ण आश्रम से विदा लेने गुरुदेव के पास गए। उन्होंने गुरुदेव के चरणों में दक्षिणा के रूप में कुछ मूल्यवान वस्तुएं समर्पित कीं। ऋषि सांदीपनि ने कहा, वत्स कृष्ण, गुरु दक्षिणा के रूप में मुझे भौतिक वस्तुएं नहीं चाहिए। जगत में दो वंश चलते हैं। एक पुत्र परंपरा का वंश, जो पूर्वजों की वंशबेल बढ़ाता है और दूसरा शिष्य परंपरा का वंश, जो विद्यादान कर गुरु का नाम अमर करता है। मेरी हार्दिक आकांक्षा है कि एक दिन तुम्हारे द्वारा दिए गए उपदेश से धर्म और न्याय की रक्षा का मार्ग प्रशस्त होगा।

और जब कुरुक्षेत्र में विषादग्रस्त और कर्तव्य-विमुख अर्जुन को श्रीकृष्ण ने गीता का अमर उपदेश देकर धर्म-रक्षा के प्रति प्रेरित किया, तो महर्षि सांदीपनि को लगा कि जैसे आज श्रीकृष्ण ने गुरुदक्षिणा प्रदान कर खुद को उऋण कर लिया।
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