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धर्म की राह का रोड़ा है माया

Yashwant Vyas

Updated Wed, 01 Aug 2012 12:00 PM IST
धर्मशास्त्रों में लिखा है कि धन-माया किसी भी व्यक्ति का सुख-चैन ले सकती है। संत व्यक्ति भी इस मोह माया के चक्कर में अपनी बौद्धिक संपत्ति गवां बैठता है, इसलिए इससे हरसंभव दूर रहने का प्रयास करना चाहिए।
एक झोंपड़ी में एक विरक्त संत रहते थे। सूर्योदय से पूर्व उठकर वह स्नान करते और भगवान के ध्यान में मग्न हो जाते।

एक दिन वह ध्यान में बैठे हुए थे। आंखें खुलीं कि सामने कुछ रुपये रखे दिखाई दिए। कोई दर्शनार्थी उनके चरणों में रुपये रखकर चला गया था। उन्होंने रुपये देखे, तो उनके मन में रुपयों के उपयोग के बारे में तरह-तरह के प्रश्न उठने लगे। इन रुपयों को किसी जरूरतमंद को दे दें। फिर सोचा कि गरीबों को कपड़े खरीदवा दें। उन्होंने जीवन में कभी रुपयों को छुआ नहीं था। इन रुपयों ने उन्हें धन के उपयोग के बारे में सोचने को विवश कर दिया।

संत उठे और दूसरी कुटिया में रहने वाले एक अन्य संत के पास पहुंचे। उन्होंने पूछा, महाराज कोई भक्त रुपये रख गया है, उनका उपयोग किस कार्य में किया जाए? संत जी ने कहा, स्वामी जी, रुपयों को आपने छुआ भी नहीं कि जिस हृदय में आप भगवान की उपस्थिति का एहसास करते थे, उसमें इस थोड़े से धन ने हलचल मचा दी। मेरा कहा मानें, रुपयों पर गोबर डाल दें और सूख जाने पर गोबर समेत उन्हें उठाकर पास की नदी में फेंक दें। संत ने ऐसा ही किया। अब उनका हृदय पूर्ववत भगवान के चिंतन में लग गया था।
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