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निरीह प्राणियों की हत्या अक्षम्य

Yashwant Vyas

Updated Mon, 30 Jul 2012 12:00 PM IST
हमारे धर्मशास्त्रों में किसी भी निरपराध की हत्या को हमेशा वर्जित माना गया है। कहा गया है कि निरीह जीवों की हत्या करने वाला कभी भी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं बन सकता। इसी संदर्भ में एक प्रसंग एक राजा का है, जो एक दिन शिकार के लिए वन में गया। वहां उसने विचरण करता एक हिरण देखा। राजा ने हिरण को निशाना लगाकर तीर छोड़ा। हिरण तीर से घायल होते ही तपस्यारत मुनि के चरणों में गिर पड़ा।
राजा वहां पहुंचा, तो तेजस्वी मुनि के चरणों में खून से लथपथ हिरण को देखकर भय से कांप उठा। उसे पता था कि ऋषि-मुनि निरीह प्राणी की हत्या से क्षुब्ध होकर श्राप दे देते हैं। भय के कारण उसके हाथ से धनुष-बाण छूट गया। हाथ जोड़कर वह बोला, मुनिश्री, मैंने शिकार के व्यसन के चक्कर में आपके आश्रम में हिरण की हत्या कर दी। मेरे अपराध को क्षमा करें।

ऋषि ने शांत भाव से कहा, राजन, हिरण मेरे आश्रम का हो या किसी अन्य का, वह आपके राज्य का ही तो जीव है। राजा का धर्म है कि अपने राज्य के प्रत्येक अहिंसक प्राणी को अभय प्रदान करे। आपने निरीह मृग की हत्या कर घोर पाप किया है। भविष्य में दूसरे को हानि न पहुंचाने वाले किसी निरपराध जीव की हत्या न करने का संकल्प लो। यह प्रायश्चित रूपी संकल्प ही तुम्हें इस पाप से उबार सकता है। राजा ने उसी समय निरीह प्राणियों की हत्या न करने का संकल्प ले लिया।
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