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संचित धन-संपत्ति की सार्थकता

Yashwant Vyas

Updated Thu, 26 Jul 2012 12:00 PM IST
धर्मग्रंथों में कहा गया है कि धन-संपत्ति संचय करने के लिए नहीं होती। अगर किसी के पास अपार संपदा है, तो उसे समझना चाहिए कि यह पूरी संपत्ति प्रभु की है और मैं उसका रखवाला मात्र हूं। उस संपत्ति का सदुपयोग करना चाहिए और गरीबों-असहायों की सेवा करनी चाहिए।
कोलकाता में एक बार भीषण अकाल पड़ा। हजारों व्यक्ति तथा गाय-बैल इसका शिकार होकर दम तोड़ने लगे। कोलकाता के सेठ मोहनदास अपार संपत्ति के मालिक थे। वह भगवान श्रीकृष्ण के परम उपासक थे। एक दिन उन्होंने मुनीम को आदेश दिया, तहखाने की एक तिजोरी में सोने की अशर्फियां रखी हुई हैं। उन्हें तुरंत निकालकर उनसे खाद्यान्न तथा हरा चारा खरीदो और खाद्यान्न गरीबों में तथा चारा गाय-बैलों को खिला दो।

सेठ जी का पुत्र अपने पिता का यह आदेश सुनकर चकित हो गया। उसे लग रहा था कि तमाम जीवन की कमाई लुटाई जा रही है। सेठ जी पुत्र का चेहरा देखकर उसकी दुविधा समझ गए। पुत्र को समझाते हुए सेठ ने कहा, बेटा, यदि ये अशर्फियां ऐसे संकट के समय तिजोरी में रखी रहेंगी, तो मैं भगवान को क्या मुंह दिखाऊंगा। तमाम धन मेरे इष्टदेव भगवान श्रीकृष्ण का ही तो है। मैं तो उनका मुनीम मात्र हूं। यदि इनसे कुछ व्यक्तियों और श्रीकृष्ण की प्यारी गायों के प्राण बच गए, तो मेरा संपत्ति अर्जित करना सार्थक हो जाएगा। पुत्र पिता के प्रेरक वाक्य सुनकर संतुष्ट हो गया।
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