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ईश्वर को पहचानने वाली आंखें

Yashwant Vyas

Updated Wed, 25 Jul 2012 12:00 PM IST
महर्षि रमण से एक दिन कुछ भक्तों ने पूछा, क्या उन्हें भगवान के दर्शन हो सकते हैं? महर्षि ने उन्हें बताया, हां, क्यों नहीं हो सकते, परंतु उन्हें पहचानने वाली आंखें चाहिए। कुछ क्षण रुककर उन्होंने कहा, एक सप्ताह तक चलने वाले समारोह के अंतिम दिन भगवान आएंगे, उन्हें पहचानकर उनके दर्शन कर लेना।
भक्तों ने मंदिर को सजाया, सुंदर ढंग से भगवान का शृंगार किया तथा संकीर्तन शुरू कर दिया। महर्षि रमण भी समय-समय पर संकीर्तन में जाकर बैठ जाते। सांतवें दिन भंडारा का कार्यक्रम था। भोग के लिए कई व्यंजन बनाए गए थे। मंदिर के सामने पेड़ के नीचे मैले कपड़े पहने एक कोढ़ी खड़ा था। वह एकटक देख रहा था कि शायद उसे भी प्रसाद मिल जाए।

एक व्यक्ति दया करके साग-पूरी से भरा एक दोना उसके लिए ले जाने लगा कि एक ब्राह्मण ने उसे लताड़ते हुए कहा, यह प्रसाद भक्तजनों के लिए है, किसी कंगाल कोढ़ी के लिए नहीं। और वह उस दोने को वापस ले आया। महर्षि रमण यह दृश्य देख रहे थे।

भंडारा खत्म होने पर भक्तों ने महर्षि से पूछा, आज सातवां दिन है, किंतु भगवान तो नहीं आए। महर्षि ने शांत मुद्रा में जवाब दिया, मंदिर के बाहर जो कोढ़ी खड़ा था, वही तो भगवान थे। तुम्हारे चर्म चक्षुओं ने उन्हें कहां पहचाना? भंडारे का प्रसाद बांटते समय भी तुम्हें इनसानों में अंतर नजर आता है। यह सुनकर भगवान के दर्शन के इच्छुक लोगों का मुंह उतर गया।
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