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सेवा-परोपकार से ही मोक्ष संभव

Yashwant Vyas

Updated Sun, 22 Jul 2012 12:00 PM IST
हमारे धर्मग्रंथों में लिखा है कि अगर हमने सेवा-परोपकार में समय नहीं बिताया, तो मोक्ष की प्राप्ति कतई नहीं हो सकती। भले ही हम कितनी ही पूजा-उपासना कर लें, पर दूसरों की सेवा किए बिना उसका फल नहीं मिल सकता। इसी से जुड़ी एक कहानी एक संत की है, जो अत्यंत विद्वान तथा त्यागी तपस्वी थे।
सबेरे से शाम तक घोर तपस्या करते, भगवान की उपासना करते। दुनियादारी से उन्हें कुछ मतलब ही नहीं था। उनकी मृत्यु हुई, तो उन्हें चित्रगुप्त के सामने ले जाया गया। वह अपनी त्याग-तपस्या तथा भक्ति के बल पर मोक्ष चाहते थे, जबकि चित्रगुप्त ने उनके कुलीन कुल में जन्म लेने की व्यवस्था की थी। संत अड़ गए कि उन्हें जन्म नहीं, मोक्ष चाहिए।

इस मामले को धर्मराज के सामने ले जाया गया। धर्मराज ने चित्रगुप्त द्वारा उनके विषय में प्रस्तुत विवरण पर निगाह डाली और बोले, महात्मन्, यह सही है कि आपने अपना जीवन घोर तपस्यामय, निष्कलंक व्यतीत किया, किंतु मानव जीवन की सार्थकता अपना त्याग-तपस्यामय जीवन बिताने के साथ-साथ परोपकार व सेवा के कार्यों में भी कुछ समय लगाने में है।

आपने संसार के दुखी प्राणियों को सुखी बनाने के लिए एक क्षण भी नहीं लगाया। उन्हें सद्कार्यों के प्रति प्रेरित नहीं किया। संत समझ गए और अगले जन्म में उन्होंने भक्ति के साथ-साथ सेवा और परोपकार कर मोक्ष प्राप्ति का संकल्प लिया।
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