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विरक्त की असली परिभाषा

Yashwant Vyas

Updated Tue, 17 Jul 2012 12:00 PM IST
एक राजा की एक महात्मा पर बहुत श्रद्धा थी। उन्होंने महात्मा के रहने के लिए अपने महल के समान एक बहुत बड़ा भवन बनवा दिया। अपने उद्यान जैसा उद्यान बनवा दिया। हाथी, घोड़े, रथ दे दिए। अपने समान ही सुख-सुविधाएं उस महात्मा के लिए जुटा दीं।
राजा महात्मा से काफी घुल-मिल गया था। एक दिन मजाक में उसने महात्मा से पूछा, हम दोनों के पास ही एक समान सुख-सुविधाओं की वस्तुएं हैं। अब आपमें और मुझमें क्या अंतर रहा? महात्मा समझ गए कि राजा बाह्य जीवन को ही महत्व दे रहा है। वह बोले, राजन, समय आने पर आपको इसका उत्तर मिल जाएगा।

एक दिन राजा जब महात्मा के पास गए, तो उन्होंने राजा से सैर करने वन चलने को कहा। जब दोनों काफी आगे पहुंच गए, तो महात्मा ने राजा से कहा, राजन, मेरी इच्छा इस नगर में लौटने की नहीं है। सुख-वैभव तो हम बहुत भोग चुके, अब हम दोनों यहीं वन में रहकर ईश्वर का भजन करेंगे। यह सुनकर राजा तुरंत बोला, भगवन, मेरा राज्य है, पत्नी है, बाल-बच्चे हैं, मैं वन में नहीं रह सकता।

महात्मा जी हंसकर बोले, राजन, मुझमें और आपमें यही अंतर है। बाहर से एक जैसा व्यवहार होते हुए भी असली अंतर मन की आसक्ति का होता है। भोगों में जो आसक्त है, वह वन में रहकर भी संसारी है। जो भोगों में आसक्त नहीं है, वह घर में रहकर भी विरक्त है। राजा महात्मा के चरणों में नतमस्तक हो गया।
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