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सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं

Yashwant Vyas

Updated Mon, 16 Jul 2012 12:00 PM IST
नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि असहायों और गरीबों की अपने हाथों से सेवा करना सच्चे धर्मों में एक है। अगर कोई भूखा है, तो उसे खाना खिलाना चाहिए और अगर कोई प्यासा है, तो पानी पिलाकर उसकी प्यास बुझानी चाहिए। संत बाबा भूमणशाह अपने गांव से गुजरने वाले यात्रियों को ठंडा पानी पिलाने, उन्हें भोजन कराने में संतोष का अनुभव करते थे। दीपालपुर नगर (पंजाब) की यह ख्याति थी कि वहां की सीमा से गुजरने वाला यात्री बिना भोजन किए नहीं जा सकता।
बाबा भूमणशाह मूक पशु-पक्षियों को अपने हाथ से चारा व दाना खिलाते-खिलाते राम नाम का उच्चारण करते, तो उनके भक्त भी पशु-पक्षियों की सेवा को तत्पर हो उठते थे। अनेक कुष्ठ रोगियों की सेवा-चिकित्सा कर बाबा ने उन्हें रोगमुक्त किया। बाबा के चमत्कारों की घटनाएं सुनकर एक बार लाहौर के कुछ धनी व्यक्ति बहुत सारा धन लेकर उनके डेरे पर पहुंचे। बाबा के दर्शन के बाद उन्होंने रुपये उनके चरण में रख दिए। बाबा बोले, मुझे आपके धन की कोई जरूरत नहीं है, अपने क्षेत्र में भंडारा शुरू करो। कोई भी व्यक्ति भूखा-प्यासा न रहे, बस इसे एकमात्र धर्म समझो।

बाबा की प्रेरणा से लाहौर के आसपास के गांवों में भंडारे शुरू हो गए। हजारों व्यक्ति भूखों को भोजन कराने के सच्चे मानवीय धर्म की ओर उन्मुख हुए। संत भूमणशाह की ख्याति सुनकर गुरु गोविंद सिंह भी उनके डेरे पर पधारे थे और उनके सेवा कार्य को सराहा था।
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