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दान से बड़ा कोई दूसरा धर्म नहीं

Yashwant Vyas

Updated Sun, 08 Jul 2012 12:00 PM IST
धर्मग्रंथों में कहा गया है कि गरीबों या अन्न-जल के संकट का सामना करने वाले लोगों को खुले हाथों से दान देना चाहिए। इससे बड़ा कोई दूसरा मानव धर्म नहीं है। इसी संदर्भ में एक प्रसंग मालवा नरेश भोज का है।
एक दिन वह रथासीन होकर कहीं जा रहे थे। सहसा सड़क पर जा रहे एक तेजस्वी ब्राह्मण को उन्होंने देखा। तत्क्षण वह रथ से उतरे और उस ब्राह्मण मनीषी के पास पहुंचकर उन्हें प्रणाम किया। उन्हें देखते ही ब्राह्मण ने अपने दोनों नेत्र बंद कर लिए। उन्होंने राजा के अभिवादन के उत्तर में आशीर्वाद तक नहीं दिया।

महाराज भोज यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने ब्राह्मण से विनम्रता से पूछा, आपने मेरे प्रणाम का न उत्तर दिया, न आशीर्वाद के शब्द कहे। उलटे अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं। आपके इस अनूठे व्यवहार का क्या कारण है?

शास्त्रज्ञ ब्राह्मण ने उत्तर दिया, महाराज, शास्त्रों में कहा गया है कि सवेरे-सवेरे किसी कृपण के सामने आ जाने पर नेत्र बंद कर लेने चाहिए। उसका मुख नहीं देखना चाहिए। आप परम वैष्णव तथा प्रजा वत्सल नरेश तो हैं, परंतु दान देने में कृपणता बरतते हैं। इसी कारण शास्त्र वचन का पालन करते हुए मैंने सूर्योदय से पूर्व आपका मुख देखना पसंद नहीं किया।

महाराज भोज ने यह बात सुनी, तो उन्हें अपनी कमी का एहसास हुआ। उन्होंने उसी क्षण संकल्प लिया कि वह गरीबों को मुक्त हाथों से दान देंगे।
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