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जब एक सेठ भगत हो गए

Yashwant Vyas

Updated Thu, 05 Jul 2012 12:00 PM IST
पंजाब के छज्जूराम ईश्वरभक्त व्यापारी थे। सबेरे उठकर स्नान करने के बाद वह भगवान का भजन करते और ठीक समय पर दुकान खोलकर सामान बेचते। उनकी ईमानदारी की पूरे नगर में धाक थी। उनके बच्चे जब जवान हो गए, तो उन्होंने पिता को आराम करने की सलाह दी और दुकान के काम में हाथ बंटाना शुरू किया।
छज्जूराम मन में सोचते कि अब 60 वर्ष की आयु हो गई, दुकान का झंझट छोड़कर क्यों न पूरा समय भगवान के भजन और जनसेवा में लगाया जाए। फिर मन कहता, अभी तो पोतों को प्रशिक्षित करना है। उनके विवाह करने हैं। उनसे निपटने के बाद दुकान छोड़नी चाहिए। इसी उधेड़बुन में वह एक सबेरे सड़क पर जा रहे थे। सफाई वाली सड़क पर झाड़ू लगा रही थी। उसने उन्हें बीच सड़क पर चलते देखकर कहा, सेठ जी, एक ओर हो जाओ। बीच में रहे, तो धूल पड़ जाएगी। इधर या उधर ही ठीक रहोगे।

सड़क साफ करने वाली महिला के इन शब्दों ने सेठ जी की आंखें खोल दीं। दुकान की चाबियां बेटे को सौंपते हुए वह बोले, दो नावों में सवार होने वाले का कभी कल्याण नहीं होता। मैंने 60 वर्ष कमाने में बिता दिए। अब शेष जीवन कमाए धन से लोगों की सेवा करूंगा और भगवान का भजन करूंगा। कुछ ही समय में सेठ छज्जूराम 'भगत छज्जूराम' के नाम से विख्यात हो गए।
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