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अद्वैत की धारणा से आदर मिलता है

Yashwant Vyas

Updated Thu, 21 Jun 2012 12:00 PM IST
आध्यात्मिक विभूति तथा क्रांतिकारी चिंतक साने गुरुजी से एक जिज्ञासु ने पूछा, भारतीय धर्मशास्त्र के किस सूत्र ने भारत को दुनिया भर में आदर दिलाया, जगद्गुरु के रूप में प्रसिद्धि दिखाई। उन्होंने उत्तर दिया, अद्वैत की धारणा ने। अद्वैत का अर्थ है कि मेरे जैसा ही दूसरा भी है। मैं जिन बातों से सुख की अनुभूति करता हूं, वैसा ही दूसरों के साथ करता रहूं। जिन बातों से मुझे कष्ट पहुंचता है, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ कदापि न करूं।
साने गुरुजी लिखते हैं, परायापन की भावना ही दुख का मूल कारण है। 'मेरा', 'तेरा' जैसी भेदमूलक भावना ही अनेक दुखों का कारण है। अद्वैत के समभाव के सिद्धांत को अपनाए बिना हम 'मेरा-तेरा' की विषमता की भावना से मुक्ति नहीं पा सकते। अद्वैत के महान संदेश से हमें प्रेरणा मिलती है कि प्राणी मात्र में एक ही जैसी आत्मा है, परमात्मा का निवास है। फिर भला अपना-पराया की भेदपरक भावना क्यों रखी जाए?

ऋषि केवल अद्वैत की कल्पना में ही नहीं रहे, वे सारे चराचरों से एकरूप हो गए, ऐसे प्रत्यक्ष उद्धरण धर्मशास्त्रों में हैं। रुद्रसूक्त लिखने वाला ऋषि मानव के शरीर, मन और बुद्धि की आवश्यकता की अनुभूति कर प्रार्थना करता है, भगवन, प्रत्येक को अन्न, भोजन, वस्त्र, विवेक, बुद्धि मिलती रहे। किसी भी अभाव के कारण वह न दुखी हो, न किसी पर निर्भर रहे। यही अद्वैत का व्यावहारिक लक्षण है। अतः कामना भी की गई है- सर्वे भवंतु सुखिनः। सर्वे संतु निरामयाः।
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