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तृष्णा को वश में रखना जरूरी

Yashwant Vyas

Updated Mon, 18 Jun 2012 12:00 PM IST
एक बार आद्य शंकराचार्य से एक भक्त ने पूछा, किसका जीवन धन्य है और कौन दुखी है। आचार्य उत्तर देते हैं, दुखी सदा को विषयानुरागी। धन्योऽस्तु को यस्यु परोपकारी। अर्थात, जो संसार के भोग में आसक्त है, वह सदा दुखी रहता है, और जो परोपकार में लगा है, उसका जीवन धन्य है।
श्री शंकराचार्य उपदेश में कहते हैं, धन, यौवन और आयु विद्युत की भांति चंचल होते हैं। विद्युच्चलं किं धनयौवनायः। मानव को इनका बड़ी सतर्कता से सत्कर्मों में उपयोग करना चाहिए। सत्कर्म ही पाप राशि को धो डालने के साधन हैं। देह सुख को क्षणिक मानकर आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए सतत प्रयासशील रहने में ही कल्याण है।

आचार्य कहते हैं, संसार में तीन चीजें अत्यंत दुर्लभ हैं- मनुष्य योनी में जन्म होना, संसार बंधन से मुक्त होने की इच्छा करना और महान आदर्श अथवा शीलवान पुरुषों का संग होना। आत्म संयम व इंद्रिय संयम को प्राथमिकता देते हुए सांसारिक सुखों के भ्रम से मुक्त रहने का हमेशा अभ्यास करना चाहिए। हमें अच्छी प्रकार जान लेना चाहिए कि सांसारिक सुख-दुख भ्रम मात्र हैं। तृष्णा, अर्थात इच्छाएं ही हमारे सुख-दुख का कारण बनती हैं। जिसकी आवश्यकताएं सीमित हैं अथवा जो इच्छाएं नहीं पालता, उसे न सुख की कामना होती है और न ही कभी अभाव का दुख होता है। आचार्य कहते हैं, जो तृष्णा को वश में नहीं कर सकता, वह दुखी व अपमानित होता है।
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