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सुख और दुख छाया हैं

Yashwant Vyas

Updated Sun, 17 Jun 2012 12:00 PM IST
धर्मग्रंथों में सांसारिक सुखों को स्वप्नवत बताया गया है। कहा गया है कि जिन वस्तुओं में हम सुखों की कल्पना कर उनकी प्राप्ति के लिए जीवन लगा देते हैं, वे ही दुख में परिवर्तित होकर हमारे तमाम सपनों को चकनाचूर कर देते हैं। इसलिए आत्मिक उन्नति में जीवन लगाना ही सार्थक है।
भागवताचार्य ब्रह्मलीन स्वामी अखंडानंद सरस्वती एक आख्यान सुनाते थे- एक शिल्पकार प्रतिदिन सुंदर-सुंदर घड़े, बरतन आदि बनाता। अचानक एक रात उसे सपने में दिखाई दिया कि वह राजा है और एक राजमहल में रानी के साथ आनंद का जीवन जी रहा है। सपना टूटा, तो वह प्रतिदिन की तरह अपने काम में जुट गया। अगले दिन फिर उसे वही सपना दिखाई दिया। उसे इस सपने से इतनी आसक्ति हो गई कि काम में रुचि कम हो गई। बरतन बनाने बैठता, तो एक भी बरतन सही नहीं बनता। कुछ दिनों बाद उसकी यह हालत हो गई कि उसके सामने खाने तक का संकट पैदा हो गया।

ज्योंही उसे भूखा रहना पड़ा, उसे बोध हुआ कि सपने की आसक्ति में जीवित नहीं रहा जा सकता। वह फिर से काम में जुट गया और शांति से जीवन बिताने लगा। स्वामी जी कहते हैं, यह भ्रांति है कि सुख और दुख सत्य है। जिस प्रकार सिनेमा के परदे पर दिखने वाले कलाकार छाया हैं, उसी तरह अंतःकरण के परदे पर जो दिख रहा है, वह भी माया ही है। इसी प्रकार सुख-दुख भी छाया हैं।
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