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विनय धर्म का मूल है

Yashwant Vyas

Updated Wed, 13 Jun 2012 12:00 PM IST
तीर्थंकर महावीर से एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया, धर्म का मूल क्या है? उन्होंने उत्तर दिया, विनय। तीर्थंकर महावीर कहते हैं, वृक्ष के मूल से सबसे पहले स्कंध पैदा होता है, स्कंध के बाद शाखाएं और फिर शाखाओं से दूसरी टहनियां निकलती हैं। टहनियों से पत्तियां फूटती हैं।
इसके बाद क्रमशः फूल, फल और रस की उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार धर्म का मूल विनय है और मोक्ष उसकी अंतिम परिणति है। विनय से ही मानव संपूर्ण शास्त्रों का ज्ञान एवं कीर्ति अर्जित करता है। विनयशील व्यक्ति ही अपने समाज तथा परिवार के प्रति दायित्वों का निर्वहन करने में सफल होता है।

महावीर कहते हैं, जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, उसे सबसे पहले क्रोध, मान, माया और लोभ छोड़ देना चाहिए। क्रोध प्रीति का और मान विनय का नाश करता है। माया मित्रता का नाश करती है। और लोभ सभी सद्गुणों का नाश कर देता है। जो अहंकार ग्रस्त होकर कटु वचन बोलता है, उसे समझ लेना चाहिए कि दुर्वचन की चोटें बड़ी मर्मांतक पीड़ा उत्पन्न करती हैं।

उन पीड़ाओं से बचे रहने का एक ही उपाय है कि हम विनयशील रहें और कभी किसी के प्रति कठोर न बनें। तीर्थंकर महावीर कहते हैं, विनय ऐसा गुण है, जो किसी को शत्रु नहीं बनने देता। उलटे शत्रुता रखने का प्रयास करने वाले को भी मित्र बना डालने की क्षमता रखता है। विनयी व्यक्ति हमेशा यश-कीर्ति का पात्र होता है। इसलिए उसे धर्म का मूल कहा गया है।
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