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जो उलझकर रह गई है आंकड़ों के जाल में

Mrinal Pandey

Updated Mon, 03 Sep 2012 12:00 PM IST
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उदारीकरण के दौर में बदहाली और अनदेखी के प्रतीक रहे भारतीय गांव अचानक ही महत्वपूर्ण होते नजर आ रहे हैं। साख तय करने वाली संस्था क्रिसिल की रिपोर्ट के चलते गांवों के प्रति आर्थिक उदारीकरण के पैरोकारों का नजरिया बदलता दिख रहा है। क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, उपभोग और खर्च के मामले में भारतीय गांवों ने शहरों को पछाड़ दिया है। गांवों का खर्च शहरों की तुलना में करीब 19 फीसदी ज्यादा हो गया है। जाहिर है, वैश्वीकरण और उदारीकरण के जरिये बेहतर आर्थिक और सामाजिक भविष्य का ताना-बाना बुनने वाले लोगों को इससे खुशी होगी। पर क्या सचमुच खुश होने का वक्त आ गया है? क्या भारतीय गांव सचमुच शहरों को पीछे छोड़ आर्थिक मानचित्र पर नई कहानी लिखने को तैयार है?
क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2010 से लेकर वित्त वर्ष 2012 तक गांवों में 3,75,000 करोड़ रुपये की खपत हुई, जबकि इसी दौरान शहरों में 2,90,000 करोड़ रुपये की खपत हुई है। यानी कुल खर्च के मामले में गांवों ने शहरों को पीछे छोड़ दिया है। क्रिसिल का मानना है कि अब भारतीय गांवों की आर्थिक धुरी सिर्फ खेती-किसानी नहीं रही है, वहां भी निर्माण गतिविधियां बढ़ी हैं।

शहरों से नजदीक स्थित गांवों के लोग सेवा क्षेत्र में खप रहे हैं। फिर सेज, औद्योगिकीकरण और उदारीकरण की नई गतिविधियों के चलते ग्रामीणों को मुआवजे मिले हैं। इसके चलते गांवों के लोगों की आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं। तमाम भ्रष्टाचार के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ाने में मनरेगा का खासा योगदान है। चूंकि पैसा गांव वालों के पास भी आ रहा है, लिहाजा वहां भी उपभोग बढ़ा है। हालंकि एक आर्थिक अखबार के सर्वे के मुताबिक, उपभोक्ता वस्तुओं का 56 फीसदी पहले से ही गांवों में खर्च हो रहा है। लेकिन प्रति व्यक्ति खर्च के आधार पर क्रिसिल के ही आंकड़ों की तुलना करें, तो गांवों की हकीकत सामने आ जाती है।

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, आज भी आबादी का 72.2 प्रतिशत हिस्सा गांवों में रहता है, जबकि शहरों में सिर्फ 27.8 फीसदी आबादी ही निवास कर रही है। जनगणना के इन आंकड़ों के मुताबिक अगर क्रिसिल के खर्च वाले आंकड़ों की तुलना करें, तो गांव अब भी पिछड़े नजर आएंगे। यानी देश की 72.2 फीसदी आबादी जहां तीन लाख 75 हजार करोड़ रुपये खर्च कर रही है, वहीं 27.8 फीसदी शहरी आबादी दो लाख 90 हजार करोड़ रुपये खर्च कर रही है। इस हिसाब से अधिसंख्य ग्रामीण आबादी अब भी शहरों की तुलना में कम ही खर्च कर रही है।

हाल ही में जारी 68वें राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में आठ करोड़ 33 लाख लोग आज भी ऐसे हैं, जिन्हें महज 17 रुपये रोजाना पर गुजर-बसर करना पड़ता है। अगर इन आंकड़ों के लिहाज से देखें, तो क्रिसिल की रिपोर्ट से भी ग्रामीण एवं शहरी जीवन की असमानता सामने आ जाती है।

सवाल है कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट के बाद भी क्या क्रिसिल की रिपोर्ट से खुश हुआ जा सकता है। इसका जवाब भले ही उदारीकरण के पैरोकार हां में बताएं, लेकिन ऐसा नहीं है। खुद क्रिसिल भी मानती है कि ग्रामीण इलाके की इस खर्च क्षमता को टिकाऊ बनाए रखने के लिए जरूरी है कि लघु अवधि की आय बढ़ाने वाली योजनाओं के साथ ही स्थायी रोजगार देने वाली योजनाएं बनाई जाएं। यानी क्रिसिल भी एक हद तक मानती है कि गांव अब भी पिछड़े हैं, जहां रोजगार के साधन बढ़ाए जाने की जरूरत है।

इसके लिए खेती आधारित उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि नए रोजगार का सृजन हो सके। क्रिसिल की रिपोर्ट में एक अच्छी बात यह है कि गांवों की उपेक्षा करने वाले आर्थिक नियंता अब गांवों में उम्मीद की किरण देख सकते हैं। तब गांवों में बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने की सोच विकसित हो सकती है और उपभोक्तावादी वस्तुओं की उत्पादक कंपनियां भविष्य में लाभ के लिए गांवों के विकास के लिए सरकार पर दबाव बना सकती हैं। लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि सोच में बदलाव रातों-रात नहीं होता। इसके लिए हमें अभी इंतजार करना होगा।
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