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कॉरपोरेट सेक्टर इतना 'विशिष्ट' क्यों

Mrinal Pandey

Updated Wed, 29 Aug 2012 12:00 PM IST
बड़ी कंपनियों के, चाहे वे सार्वजनिक क्षेत्र की हों या निजी क्षेत्र की, निदेशक मंडलों में अनुसूचित तबके की गैरमौजूदगी का सवाल पिछले दिनों सुर्खियां बना। एक तरफ संसदीय समिति ने एयर इंडिया की सामाजिक संरचना को लेकर सवाल उठाए और उसी के आसपास देश के कॉरपोरेट बोर्डों की जाति विविधता जांचने के लिए किए गए अध्ययन के नतीजे भी सामने आए।
खबर आई कि संसदीय समिति ने एयर इंडिया में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कम प्रतिनिधित्व को लेकर सरकार की आलोचना की और इस बात की हिमायत की कि न केवल उच्च श्रेणी के अधिकारियों के पदों पर अनुसूचित तबकों की नियुक्ति एवं उनके लिए आरक्षण मिलना चाहिए, बल्कि सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कंपनी के निदेशक बोर्ड में अनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्य को स्वतंत्र निदेशक के तौर पर स्थान मिले।

इसे संयोग कहा जा सकता है कि इस रिपोर्ट का जिन दिनों प्रकाशन हुआ, उन्हीं दिनों कनाडा की नार्थ कोलंबिया यूनिवर्सिटी के विद्वतजनों डी अजित, हान दोनकर एवं रवि सक्सेना की टीम की भारत के कॉरपोरेट बोर्डों की समाजशास्त्रीय विवेचना सामने आई। उन्होंने भारत की अग्रणी एक हजार कंपनियों के कॉरपोरेट बोर्ड का अध्ययन किया। उनके मुताबिक, कॉरपोरेट बोर्ड आज भी 'ओल्ड बॉयज क्लब' बने हुए हैं, जो जातिगत जुड़ाव पर आधारित हैं, न कि प्रतिभा या अनुभव जैसे पैमानों पर।
जिन एक हजार कंपनियों का उन्होंने अध्ययन किया, उसमें निदेशक बोर्ड की औसत सदस्य संख्या नौ थी, जिनमें से 88 फीसदी इनसाइडर थे, अर्थात कंपनी से ही संबंधित लोग थे और सिर्फ 12 फीसदी स्वतंत्र निदेशक थे।

जातिगत आधार पर देखें, तो इनमें से 93 फीसदी उच्च जातियों से जुडे़ थे, तो अन्य पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जाति और जनजाति से क्रमशः 3.8 और 3.5 फीसदी लोग थे। इकोनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के अंश में लेखकों ने सवाल उठाया, ‘इस बात पर सहसा यकीन नहीं किया जा सकता कि अनुसूचित तबके का कम प्रतिनिधित्व प्रतिभा की कमी के चलते है। दरअसल यहां हम जाति को नेटवर्किंग के अहम कारक के तौर पर देख सकते हैं। कॉरपोरेट भारत की छोटी दुनिया में जातिगत रिश्तों के ताने-बाने में ही अंतर्क्रिया चलती रहती है।’

इस सर्वेक्षण को भारतीय उद्योगपतियों के सबसे बड़े संगठन कहे जानेवाले कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज (सीआईआई) ने पिछले साल अंजाम दिया था। सर्वेक्षण में कुछ विचलित करनेवाले तथ्य सामने आए। मसलन, भारत के सबसे औद्योगीकृत कहे जानेवाले राज्यों में निजी क्षेत्र में अनुसूचित जाति एवं जनजातियों का अनुपात, राज्य की आबादी में उनके अनुपात को कहीं से भी प्रतिबिंबित नहीं करता।

उदाहरण के लिए, वर्ष 2008-2009 के वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण में औद्योगिकीकरण एवं रोजगार के मामले में महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर है, जबकि वहां इन तबकों का रोजगार में अनुपात महज पांच फीसदी है। आबादी में अनुपात एवं रोजगार में उनकी संख्या का बेमेल रिश्ता हम कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में भी देख सकते हैं। गौरतलब है कि अकेले तमिलनाडु में इन वंचित तबकों का निजी क्षेत्र में अनुपात आबादी में उनके हिस्से के लगभग समानुपातिक है। जैसे इनकी आबादी का प्रतिशत 20 फीसदी है, जबकि उद्योगों में उनकी उपस्थिति का प्रतिशत 17.9 फीसदी है। दक्षिण के अन्य राज्यों में भी इसी किस्म की स्थिति है।

हम सभी जानते हैं कि आरक्षण की किसी भी योजना का या अमेरिका में कायम अफर्मेटिव ऐक्शन के किसी भी कार्यक्रम का बुनियादी तर्क क्या होता है। इसके मुताबिक जाति/जेंडर/नस्ल जैसी जन्मगत श्रेणियों के आधार पर बंटे समाज में अगर सभ्यतात्मक कारणों से पीछे छूटे समुदायों को समान अवसर हासिल करने की स्थिति में लाना है, तो उनके लिए सकारात्मक विभेद की नीतियां लागू करनी ही होंगी। यह लोकतंत्र का तकाजा है कि हुकूमत में बैठे लोग ऐसे उत्पीड़ित तबकों के लिए खास योजना बनाएं।
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