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आर्थिक विकास की दो तसवीरें

Mrinal Pandey

Updated Sun, 05 Aug 2012 12:00 PM IST
Two pictures of Economic Development
भारत में आर्थिक सुधार के दो दशकों में विभिन्न वर्गों को मिलने वाले लाभ और लोगों के जीवन स्तर के बारे में जानकारी लेने हेतु राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन ने जुलाई, 2011 से जून, 2012 की अवधि के दौरान पारिवारिक खर्च का सर्वेक्षण किया है। इसके मुताबिक देश में सबसे धनी और सबसे गरीब तबकों के बीच खरीद क्षमता का अंतर लगातार बढ़ रहा है।
यही नहीं, शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच भी आर्थिक विषमता बढ़ रही है। ग्रामीण इलाके की सबसे गरीब 10 फीसदी आबादी जहां आज भी रोजाना 17 रुपये से कम पर गुजर-बसर करने को मजबूर है, वहीं शहरी क्षेत्र की सबसे गरीब 10 फीसदी आबादी का प्रतिव्यक्ति दैनिक खर्च मात्र 23.40 रुपये है।

सर्वेक्षण के मुताबिक, शहरी इलाकों में 70 फीसदी आबादी करीब 43.16 रुपये दैनिक खर्च करती है, जबकि ग्रामीण इलाके की आधी आबादी रोजाना 34.33 रुपये प्रतिव्यक्ति खर्च कर गुजर-बसर करती है। यानी देश की आर्थिक तसवीर पर दो चेहरे उभरे हैं। एक चेहरा देश में अमीरों की तेजी से बढ़ती संख्या बता रहा है, वहीं दूसरा चेहरा बढ़ती गरीबी और आम आदमी की कठिनाइयों का आभास दे रहा है।

इसमें संदेह नहीं कि पिछले दो दशकों में देश में प्रतिव्यक्ति आय लगातार बढ़ी है। पिछले वित्त वर्ष में प्रति व्यक्ति आय 60,972 रुपये सालाना रही है। वैश्विक स्तर पर संपत्ति सृजन में योगदान करने में भारत दुनिया का छठा सबसे बड़ा देश बन गया है। इसी तरह मैरिल लिंच ग्लोबल वेल्थ मैनेजमेंट और कंपजेमिनी द्वारा जारी एशिया-पैसेफिक वेल्थ रिपोर्ट-2011 में कहा गया है कि 2010 में भारत में करोड़पतियों की संख्या 1 लाख 53 हजार हो गई है।

करोड़पतियों की संख्या की दृष्टि से पूरी दुनिया में भारत 12वें स्थान पर है। वर्ष 2015 तक देश में करोड़पतियों की संख्या बढ़कर 4,03,000 हो जाएगी। अमेरिकी मैग्जीन फोर्ब्स के मुताबिक, दुनिया के धनकुबेरों की सूची में भारत एशिया और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में अग्रणी देश बन गया है।

लेकिन दूसरी ओर आर्थिक तसवीर का दूसरा चिंताजनक चेहरा बता रहा है कि विकास के लाभ न्यायोचित रूप से गरीबों तक न पहुंचने के कारण देश के करोड़ों गरीबों की भूख से जुड़ी पीड़ाएं और उनके जीवन में आर्थिक चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। चूंकि देश में गरीबी की सर्वमान्य परिभाषा नहीं है, लिहाजा अलग-अलग समितियों ने अपने-अपने पैमाने पर गरीबी के आंकड़े पेश किए हैं।

ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनीशिएटिव ने मल्टी डाइमेन्शनल पॉवर्टी इंडेक्स यानी एमपीआई का इस्तेमाल करते हुए कहा कि देश में 2011 में 65 करोड़ लोग गरीब हैं। इनमें से 42 करोड़ से ज्यादा लोग बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में रहते हैं। यह संख्या 26 अफ्रीकी देशों में रहने वाले गरीबों से भी ज्यादा है। यही हकीकत तरक्की के हमारे तमाम दावों की पोल खोल देती है।

वैश्वीकरण के पिछले दो दशकों में निम्न मध्यवर्ग की परेशानियां भी बढ़ती गई हैं। इनकी पीड़ाओं में महंगाई, सामाजिक सुरक्षा, बच्चों की शिक्षा, रोजगार, कर्ज पर बढ़ता ब्याज जैसी कई सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां भी छिपी हुई हैं।

इन ताजा आंकड़ों ने भारत की विकास-गाथा के आगे चिंताजनक सवाल खड़े कर दिए हैं। इस सर्वेक्षण ने अर्थशास्त्र के इस सिद्धांत को लगभग नकार दिया है कि विकास से जब आमदनी बढ़ती है, तब उसका लाभ पहले पूंजी लगाने वाले उच्च वर्ग को मिलता है, लेकिन धीरे-धीरे यह लाभ आम आदमी तक भी पहुंचता है।

हमारी अर्थव्यवस्था की चुनौतियां सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत के समय कहा गया था कि रोजगार तेजी से बढ़ेंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। सरकारी क्षेत्र में तो नौकरियों में कमी आई ही, निजी क्षेत्र में भी रोजगार में कोई दमदार बढ़ोतरी नहीं हुई। लिहाजा हमें विकास दर और अरबपतियों की बढ़ती संख्या पर खुश होने के बजाय आर्थिक विषमता और समाज के आम आदमी के दुःख-दर्द से संबंधित भयावह तसवीर दिखाने वाली रिपोर्टों पर अवश्य गौर करना चाहिए।

वैश्वीकरण में गरीबों और निम्न मध्यवर्ग की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति होगी, तभी उनकी कार्य क्षमता बढ़ेगी और वे विकास में अपना योगदान दे सकेंगे। सरकार के लिए जरूरी है कि वह आय और धन के वितरण की भारी असमानता मिटाने के लिए कमजोर वर्ग के लोगों की आय बढ़ाने के कारगर प्रयास करे।

इसके लिए केवल भोजन की कैलोरी से गरीबी रेखा का निर्धारण करना उचित नहीं होगा, बल्कि भोजन की कैलोरी के साथ-साथ शिक्षा एवं स्वास्थ्य मद पर खर्चों के परिप्रेक्ष्य में गरीबी की नई रेखा भी निर्धारित करे, ताकि वास्तविक जरूरतमंदों को सरकारी योजनाओं के लाभ मिल सकें। जरूरी होगा कि आम आदमी और गरीबों की क्षमताओं को नई दिशा देकर रोजगार के अवसरों की ओर प्रवृत्त किया जाए।

गांवों में जहां महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को व्यापक और प्रभावी बनाना होगा, वहीं शहरी गरीबों के रोजगार के लिए भी मनरेगा जैसी योजना को शीघ्र बनाकर लागू करना होगा ताकि समग्र विकास सुनिश्चित हो सके। सरकार को हरसंभव प्रयास करना होगा कि आर्थिक विकास के लाभ आम आदमी तक भी अवश्य पहुंचें।
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