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चमत्कार से नहीं चलती अर्थव्यवस्था

Mrinal Pandey

Updated Fri, 06 Jul 2012 12:00 PM IST
Government Economy Prime Minister Manmohan Singh Finance Minister
सरकार का ध्यान अर्थव्यवस्था पर है और प्रधानमंत्री वित्त मंत्री की नई भूमिका में हैं। उनसे काफी अपेक्षाएं हैं, जो होनी भी चाहिए। हालांकि विरोधाभास हैं और निराशाजनक आंकड़े भी, लेकिन इनके बीच आर्थिक मोरचे पर कुछ सकारात्मकता भी दिखती है, जिसका स्वागत करना चाहिए। ऐसा लगता है कि भविष्य के बारे में उद्योगपतियों के विचार जानना प्रधानमंत्री एवं उनकी आर्थिक टीम के लिए उपयोगी होगा।
हम ब्रिटेन और यूरोप में आर्थिक संकट के गवाह हैं। जैसी स्थिति है, उसमें मामूली स्तर की मंदी भी हमारे लिए बड़ी चुनौती पैदा कर सकती है। हमने मध्य पूर्व के उथल-पुथल को भी देखा है, जहां स्वतंत्रता पर अंकुश और सामंती सत्ता की तानाशाहियों ने आर्थिक संकट को और भयावह ही किया है। अपने देश में भी आर्थिक विकास दर नौ फीसदी के शिखर से लुढ़ककर छह फीसदी के आसपास रह जाने की आशंका है। इस दौरान विश्व बाजार में कच्चे तेल का मूल्य अप्रत्याशित ढंग से बढ़ा, लेकिन सरकार ने उसके अनुरूप पेट्रो उत्पादों के दाम नहीं बढ़ाए, क्योंकि चुनावी वर्ष में इसका नकारात्मक असर पड़ सकता था।

सत्ता के गलियारे से बाहर निकलकर देखें, तो जनता में काफी असंतोष है। वहां बिजली बिल, दूध एवं ब्रेड की कीमत, स्कूल एवं ट्यूशन फीस, दवा एवं अस्पताल के बढ़ते खर्च के अलावा और किसी बात की चर्चा सुनाई नहीं देती। जन असंतोष की सूची अनंत है। इस महीने डीजल एवं रसोई गैस की कीमतों में भी बढ़ोतरी की आशंका है। इधर दिल्ली सरकार ने बिजली की कीमतों में 25 फीसदी का इजाफा कर दिया है।

रियायती मूल्य पर पेट्रोल, डीजल, केरोसिन, रसोई गैस एवं उर्वरक की आपूर्ति के कारण अर्थव्यवस्था दिवालिएपन के कगार पर है। हर राज्य दबाव में है और केंद्र से राहत पैकेज की मांग कर रहा है, जबकि केंद्र खुद राहत चाहता है। लेकिन अर्थव्यवस्था चमत्कारों के भरोसे नहीं चल सकती। वैश्विक अर्थ संकट के इस दौर में यूरोप में आपातकालीन कार्रवाई दिख रही है। भारत और चीन समेत सभी ब्रिक्स देशों के लिए भी विकास एकमात्र विकल्प है।

एक देश के रूप में यह नहीं भूलना चाहिए कि दस या बीस साल पहले हम कहां थे, और पिछले दिनों की विकास की गति बनाए रखने पर अगले दशक में हम कहां होंगे। यह समय चुनावी लाभ-हानि के बारे में सोचने का नहीं, बल्कि चुनौतियों से पार पाने का है, जिनमें ऊर्जा संकट एक बड़ी चुनौती है। महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाला देश रोजाना आठ से बारह घंटे की बिजली कटौती नहीं झेल सकता। बिजली के अभाव में लंबे समय तक जेनरेटर चलाए जाते हैं, जो डीजल की आपराधिक बरबादी है। दिल्ली की मुख्यमंत्री यदि अगले छह महीने तक भी 90 से सौ फीसदी बिजली मुहैया करा पाएं, तो इसे देश का अव्वल महानगर बनने से कोई नहीं रोक सकता।

हम अमेरिका से कोयले का आयात करते हैं। लाखों टन कोयले का आयात हो रहा है। यानी ऊर्जा के मोरचे पर गंभीर स्थिति देखकर दिल्ली की मुख्यमंत्री ने बिलकुल सही फैसला लिया। हम सभी जानते हैं कि हाल के दिनों में गैस और कोयले का मूल्य काफी बढ़ा है और अगर हम अपना उत्पादन बढ़ाना चाहते हैं, तो इस संकट को दूर करने के लिए कीमत चुकाने के अलावा कोई चारा नहीं है। कमजोर वर्गों के उपभोक्ता, जो करीब 60 फीसदी के आसपास हैं, 200 यूनिट की सीमा तक बिजली उपभोग कर अपना संरक्षण कर सकते हैं, जबकि अन्य लोगों के लिए, जो छह से आठ घंटे जनरेटर चलाते हैं, डीजल के मौजूदा मूल्य के दौर में 90 फीसदी बिजली आपूर्ति सस्ती पड़ेगी।

विगत जून बिजली आपूर्ति के लिहाज से पिछले दस वर्षों में सबसे खराब रहा है। छह से 12 घंटे बिजली गायब रहना सामान्य बात थी। महरौली में ज्यादातर आदमी को मैंने जनरेटर एवं इनवर्टर का उपयोग करते देखा। हालांकि पिछले कुछ दिनों से बिजली कटौती गिरकर एक-दो घंटे पर आ गई है, लेकिन कुछ ही दूरी पर हरियाणा के सीमांत इलाके के गांवों में 10 से 12 घंटे बिजली गायब रहती है। अगर दिल्ली की मुख्यमंत्री ने बिजली के दाम बढ़ाने का फैसला पहले ही लिया होता, तो वह अच्छा होता। नेता तो वही है, जो कई बार जनभावनाओं के खिलाफ फैसला लेने का साहस कर सके।

मैं इस बात में विश्वास नहीं करता कि स्थिति बहुत खराब है और उसका कोई समाधान नहीं हो सकता। लेकिन मुझे किसी चमत्कार में भी यकीन नहीं है। जैसी स्थिति है, उसमें वैश्विक स्तर पर यूरोप को लेकर लगातार हलचल बनी रहेगी और संकट खत्म होने में अभी समय लगेगा। दरअसल जब मंदी आती है, तब उससे निकलने का कोई आसान उपाय नहीं होता। इसलिए हमें हर मुश्किल चुनौती के लिए तैयार रहना चाहिए।

व्यक्तिगत रूप से मेरा आकलन यह है कि इस साल हमारी आर्थिक विकास दर छह फीसदी से नीचे जाएगी और अगले साल यह गिरकर पांच फीसदी रह सकती है। इसलिए हमें दबाव में जीना सीखना होगा। यह नहीं मालूम कि भविष्य में कौन जीतेगा और कौन हारेगा, पर हमारे सामने आर्थिक संकट है। इससे निपटने के लिए आवश्यक है कि केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार को हर राज्य सरकार, चाहे वह किसी भी पार्टी की क्यों न हो, मदद और सहयोग दे।
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