आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

जयपुर

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

राजस्थान +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

वे खेती न छोड़ें तो क्या करें

Mrinal Pandey

Updated Tue, 05 Jun 2012 12:00 PM IST
What to do if they leave farming
नव उदारवादी अर्थव्यवस्था में तीव्र औद्योगिकीकरण ने जिस क्षेत्र को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया, वह खेती-किसानी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश में लगभग 30 करोड़ किसान ऐसे हैं, जो या तो खेती छोड़ चुके हैं या ऐसा करने का मन बना रहे हैं। अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले वर्षों में चीन में करीब 50 करोड़ किसान खेती करना छोड़ देंगे। कृषि से किसानों के मोहभंग की स्थिति भारत की तुलना में चीन में फिलहाल अधिक नियंत्रित है, क्योंकि वहां ऐसी नीतियां बनीं, जिनके तहत किसानों को खेती करने के लिए एक सीमा तक बाध्य किया जा सकता है।
दरअसल विकासशील देशों के उष्णकटिबंधीय वातावरण में किसानों के पास अमूमन छोटी जोतें होती हैं, जिससे उनका या उनके परिवार का बमुश्किल पेट भर पाता है। भारत या एशियाई देशों में सरकारी नीतियों में बदलाव तो हुए, पर उसमें स्थायी खेती की जगह पर अत्यधिक उत्पादन पर जोर दिया गया। तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल की वजह से खेती करना अत्यधिक खर्चीला हो गया है, जिसे वहन करना किसानों के लिए आसान नहीं। आज अगर कृषि से किसानों का मोहभंग तेजी से हो रहा है, तो इसकी वजह यह भी है कि अब खेती करना फायदे का सौदा नहीं रहा।

वर्ष 2005 के नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि देश के लगभग आधे किसान उसी वक्त खेती करना छोड़ देंगे, जब उन्हें आजीविका का कोई दूसरा साधन मिल जाएगा। विद्रूप है कि तब से तसवीर बदलने की कोशिश नहीं हुई और किसानों की स्थिति बद से बदतर ही हुई है। आज हालात ये हैं कि किसानों के बेटे खेती करने के बजाय किसी दफ्तर में चपरासी बनना ज्यादा पसंद करने लगे हैं। इसकी वजह भी स्पष्ट है। खेती से उन्हें आमदनी नहीं हो रही। पिछली फसल में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,200 रुपया प्रति क्विंटल तय किया गया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गेहूं पट्टी के किसानों का कहना था कि गेहूं की खेती में लागत मूल्य 1,000 रुपये प्रति क्विंटल से भी अधिक होती है, लिहाजा ऊंची लागत को देखते हुए सरकार अगर गेहूं का उचित मूल्य तय नहीं करती, तो उनके लिए भविष्य में गेहूं की खेती करते रहना संभव नहीं है।

एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले किसान आयोग ने देश में किसानों की बदहाल स्थिति को देखते हुए सिफारिश की थी कि सी2 प्लस 50 फॉरमूला के तहत सभी अनाजों के लिए सरकारी मूल्य निर्धारित किए जाएं। यहां सी2 का अर्थ है, फसल उगाने में आई कुल लागत। इसमें मजदूरी भी शामिल है, जिसकी गणना न्यूनतम मजदूरी मूल्य के आधार पर होनी चाहिए। साथ ही कुल फसल लागत का आधा हिस्सा बतौर लाभ इसमें जोड़कर ही न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होना चाहिए। मसलन, अगर हम गेहूं की बात करें और इसकी उपज में कुल 1,000 रुपये लागत आए, तो किसान आयोग के अनुसार इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,000+500 यानी 1,500 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए। जबकि सरकार ने यह मूल्य 1,200 रुपए प्रति क्विंटल ही तय किया है! लिहाजा इस प्रतिकूल आर्थिक गणित में भला कोई किसान खेती करे भी, तो कैसे?
हालांकि बात यहीं खत्म नहीं होती।

उत्तर प्रदेश में भारतीय खाद्य निगम और निजी डीलरों के बीच की साठगांठ के चलते किसानों की स्थिति कोढ़ में खाज जैसी है। निगम गेहूं की खरीद पर ऐसी शर्तें लगा देता है कि किसानों के लिए गेहूं बेचना आसान नहीं होता। एक बार वह अपना अनाज लेकर सरकारी खरीद केंद्र पहुंच भी जाए, तो वहां वह पूरी तरह से खाद्य निगम के अधिकारियों की दया पर निर्भर हो जाता है। ये अधिकारी कभी गेहूं के गीले होने की बात कहकर, तो कभी गंदा होने या फिर कोई अन्य बहाना बनाकर खारिज कर देते हैं। चूंकि किसानों के पास भंडारण का उपाय नहीं होता, ऐसे में उचित भंडारण के अभाव में वह फसल को अपने घर पर नहीं रख सकता, और सरकार की तरफ से भी इसका कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है। दूसरी ओर सरकारी खरीद केंद्र से अनाज वापस ले जाना उसकी लागत बढ़ाता है, लिहाजा उसके पास औने-पौने दामों में गेहूं बेचने के अलावा कोई उपाय नहीं होता। इन केंद्रों पर बिचौलिये या निजी डीलर भी इसी ताक में रहते हैं। वे ऐसी परिस्थिति का खूब फायदा उठाते हैं, और करीब 800 रुपये क्विंटल की दर से गेहूं खरीदते हैं।

क्या विडंबना है कि पूरे साल हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद भी किसानों को प्रति क्विंटल 200 रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है। इससे छोटी जोत का किसान ज्यादा प्रभावित होता है। छोटे किसानों के पास औसतन दो एकड़ जमीन होती हैं, जिनमें कमोबेश वे 20 क्विंटल प्रति एकड़, यानी कुल 40 क्विंटल गेहूं उपजाते हैं। अब प्रति क्विंटल 2,00 रुपये के नुकसान की दर से जोड़ें, तो उसे कुल फसल पर लगभग 8,000 रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा। इसका परिणाम यह होता है कि वह किसान कर्ज में साल-दर-साल डूबता चला जाता है, और उसके बेटे के पास पढ़ाई बीच में ही छोड़कर मजदूरी के लिए शहर जाने के अलावा कोई उपाय नहीं बचता। उसे न सिर्फ अपना कर्ज चुकाना होता है, बल्कि परिवार के लिए दो जून की रोटी का भी इंतजाम करना पड़ता है। विद्रूप है कि साल-दर-साल इसी चक्र के चलने के बावजूद हमारी सरकार हाथ पर हाथ रखकर बैठी रहती है। अब भी समय है, सरकार किसानों की यह पीड़ा दूर करने के बारे में सोच सकती है।
  • कैसा लगा
Write a Comment | View Comments

Browse By Tags

स्पॉटलाइट

अपनी इस फिल्म के लिए अनिल कपूर ने दी थी इतनी बड़ी कुर्बानी, बाद में मिला धोखा

  • बुधवार, 24 मई 2017
  • +

तलाक के चार दिन बाद ही अरबाज ने लिया ऐसा फैसला, मलाइका के पैरों तले खिसक जाएगी जमीन

  • बुधवार, 24 मई 2017
  • +

फिर जुड़वा बच्चों की मां बनने वाली है गुमनाम हुई ये हीरोइन, अरबों की मालकिन बन दुबई में रह रही

  • बुधवार, 24 मई 2017
  • +

नीरस होते रोमांस में गर्माहट ला देंगे ये तेल, रानियां भी करती थीं इस्तेमाल

  • बुधवार, 24 मई 2017
  • +

Modi@3: मोस्ट स्टाइलिश पीएम ऑफ द वर्ल्ड, देखें जानदार 'Look'

  • बुधवार, 24 मई 2017
  • +

Most Read

ये तय करेंगे लोकसभा चुनाव के नतीजे

Four Implications Leading Up to India’s 2019 General Election
  • सोमवार, 22 मई 2017
  • +

विपक्षी एकता की परीक्षा

Test of Unity of Oppositions
  • मंगलवार, 23 मई 2017
  • +

दूसरी पारी में चुनौती अमेरिका से भी

Challenge in second term from US too
  • बुधवार, 24 मई 2017
  • +

ऐसे में कैसे पढ़ेंगी बेटियां

How to read daughters in this situations
  • शनिवार, 20 मई 2017
  • +

उत्तर प्रदेश का भविष्य

Future of Uttar Pradesh
  • रविवार, 21 मई 2017
  • +

सरकार की कमी पूरी करते एनजीओ

NGOs Doing government works in pakistan
  • शुक्रवार, 19 मई 2017
  • +
Live-TV
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!
Top