आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

राजस्थान

पूंजीवादी दुनिया में बदलती युवा सोच

Mrinal Pandey

Updated Mon, 07 May 2012 12:00 PM IST
Capitalist world changing youth thinking
हम किसी नीति में छोटे-मोटे बदलाव की मांग नहीं कर रहे। हम तो पूरी व्यवस्था बदलना चाहते हैं। ये शब्द ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट मूवमेंट की एक आयोजक मरिसा होम्स के हैं। वह उन लोगों में से एक हैं, जिन्होंने मई दिवस पर न्यूयॉर्क, लास एंजेलिस, सैन फ्रांसिस्को, शिकागो, सिएटल, वाशिंगटन आदि में इस अभियान को पुनः ताकत देने की कोशिश की है। व्यवस्था को बदलने वाली सोच केवल इन्हीं लोगों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बुद्धिजीवियों और युवाओं तक में धीरे-धीरे अपना स्थान सुनिश्चित कर रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन वर्गों का पूंजीवादी संस्थाओं और उनसे जुड़ी एक तरह से कंजरवेटिव विचारधारा में विश्वास कम हो रहा है। अगर ऐसा है, तो क्यों?
लैटिन अमेरिकी देशों को छोड़ दें, जहां इस तरह की संस्थाओं के प्रति पहले से ही नजरिया अनुदार था, तो 2008 से दुनिया के तमाम देशों में न केवल वित्त और बैंकिंग क्षेत्र पर प्रहार हो रहे हैं, बल्कि प्राइवेट इक्विटी के शीर्ष पर भी हमले होते प्रतीत हो रहे हैं। पूंजीवादी देशों में बहुत सारी प्राइवेट इक्विटी फर्मों को ढोया जा रहा है या फिर सरकारी तंत्र उन्हें जीवन रक्षक प्रणालियों पर रखे हुए है।

इसके पीछे उद्देश्य यह बताया जा रहा है कि पहले इन प्राइवेट इक्विटी फर्मों को अधिग्रहीत किया जाए, उन्हें और अधिक क्षमतावान बनाया जाए, और फिर लाभ की स्थिति में लाकर बेच दिया जाए। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में यह नहीं देखा जा रहा कि जिस पूंजी सहयोग से इन्हें जिंदा रखने का प्रयास किया जा रहा है, वह किसके खून-पसीने की कमाई है? ऐसे में स्टिंग्लिट्ज का वह कथन फिर से साकार होता दिख रहा है कि अमेरिका को अमेरिका बनाने में एक पूरी की पूरी नस्ल (रेड इंडियंस) समाप्त हो गई। यानी बेरहम पूंजीवाद मानव पूंजी की चिंता नहीं करता, बल्कि इसका मूल चिंतन वित्तीय लाभ को लेकर है। पूंजीवादी नीतियों वाले देशों का युवा शायद कमाई के इस मानव-विरोधी तंत्र के खोल में अब घुटन महसूस कर रहा है।

विगत दिसंबर में अमेरिका में हुए एक सर्वेक्षण से पता चला कि वहां के 50 प्रतिशत लोगों ने ही पूंजीवाद के प्रति अपनी सकारात्मक अभिव्यक्ति दी। सर्वेक्षण में यह बात स्पष्ट तौर पर उभरकर सामने आई कि वहां के युवा पूंजीवाद की अपेक्षा समाजवाद के प्रति अधिक सकारात्मक विचार रखते हैं। दरअसल पिछले कुछ समय से विकसित देशों में यह शंका पैदा हो गई है कि पूंजीवादी संस्थाओं के कारनामों का नतीजा कहीं लोकतांत्रिक संस्थाओं को भुगतना न पड़ जाए।

इसके बावजूद अमेरिकी युवाओं का यह रुख उन विकसित देशों के लिए शुभ नहीं है, जहां लोग भौतिकवादी जीवन में विश्वास करते हैं। अगर युवाओं का नजरिया इसी तरह बदला, तो भविष्य में बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसका संकेत पिछले दिनों फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में भी मिल चुका है, जिसने ‘संकट में पूंजीवाद’ विषय पर एक शृंखला प्रकाशित कर लोगों की राय जानने का प्रयास किया था।

इस सर्वेक्षण में पाया गया कि केवल 46 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक ही अब वाणिज्य और व्यापार में और केवल 25 प्रतिशत लोग ही बैंकों पर भरोसा करते हैं। अगर अमेरिकी इन संस्थानों से अब दूर भाग रहे हैं, तो फिर वित्तीय फर्मों द्वारा अपने प्रमुख कार्याधिकारियों को मोटी तनख्वाह एवं कई तरह की सुविधाएं देने की वजह क्या है?

ऐसा नहीं है कि पूंजीवादी नीतियों की विफलता के बाद केवल युवा ही समाजवादी नीतियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, विकसित देशों की सरकारों का रवैया भी कुछ ऐसा ही है। पूंजीवादी सरकारें और उसकी समस्त वित्तीय व बैंकिंग संस्थाएं लाभ की स्थिति में निजीकरण और नुकसान की स्थिति में समाजवाद के सिद्धांत पर चलने की रणनीति अपनाती दिखाई दे रही हैं। हमारी सरकारें भी इसी ढर्रे पर चल रही हैं। वैश्वीकरण के इस युग में हम दुनिया से अलग रास्ता नहीं बना सकते, लेकिन हो रहे बदलाव का अध्ययन तो कर सकते हैं, क्योंकि हमारी समग्र कूटनीति, यहां तक कि सामरिक नीतियां भी अब इनसे काफी हद तक प्रभावित हो रही हैं।
  • कैसा लगा
Write a Comment | View Comments

Browse By Tags

स्पॉटलाइट

Bdy Spcl: हमेशा विवादों में रहीं रिया सेन- कभी सेट से चुराए कपड़े तो कभी खुद लीक कराया अपना MMS

  • मंगलवार, 24 जनवरी 2017
  • +

ऋतिक की पार्टी में पहुंची एक्स वाइफ सुजैन, 'काबिल' देखकर पति को भर लिया बाहों में

  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

हर लड़के के लिए ये 6 काम है जरूरी, तभी खुश रहेगी गर्लफ्रेंड

  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

काबिल ऋतिक की 8 नाकाबिल फिल्में, हो गई थी फ्लॉप

  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

अमिताभ नहीं अब ये हीरो करेगा 'केबीसी' को होस्ट

  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

Most Read

न्याय चाहिए, मुआवजा नहीं

Want justice, not compensation
  • गुरुवार, 19 जनवरी 2017
  • +

अर्द्धसैनिक बल और सेना में फर्क

difference in Paramilitary forces and the army
  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

बजट में दिखेंगे नोटबंदी के फायदे

Advantage of Demonitisation will show in Budget
  • सोमवार, 23 जनवरी 2017
  • +

चीन की बराबरी के लिए सुधार जरूरी

Reforms is must for china equipollence
  • रविवार, 22 जनवरी 2017
  • +

यह कैसी आचार संहिता है

What type of this Code of Conduct
  • रविवार, 22 जनवरी 2017
  • +

चुनाव सुधार के रास्ते के रोड़े

Hurdel of Election reforms
  • बुधवार, 18 जनवरी 2017
  • +
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!
Top