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जो बोया सो काट रहा है

Mrinal Pandey

Updated Wed, 02 May 2012 12:00 PM IST
Jo boya so kaat raha hai
सदियों से पंजाब कृषि प्रधान राज्य का गौरव पाता रहा है। घोर संकट के दौर में भी पंजाब के किसानों ने अपनी खेती को मरजीवड़ों की तरह संभाल कर रखा। इसके पीछे गुरु नानक देव जी की वह चेतना भी थी, जिसमें उन्होंने खुद करतारपुर में खेती की थी। उन्होंने कृषि को नाम से भी ऊपर रखा था। लेकिन पिछले तीन दशकों से आर्थिक विकास की एक ऐसी आंधी चली है, जिसने इस राज्य को भी बरबाद कर दिया है। पंजाब की खेती-किसानी का सबसे बड़ा संकट आज यही है कि वह प्रकृति से अपनी रिश्तेदारी का लिहाज भूल गई है। पवन, पानी और धरती का तालमेल तोड़ने से ढेरों संकट बढ़े हैं।
पंजाब ने पिछले तीन दशकों में कीटनाशकों का इतना अधिक इस्तेमाल कर लिया कि पूरी धरती को ही तंदूर बना डाला है। योजनाकार अब लिखते हैं कि पंजाब के 40 प्रतिशत छोटे किसान या तो समाप्त हो चुके हैं या अपने ही बिक चुके खेतों में मजदूरी कर रहे हैं। राज्य के 12,644 गांवों में प्रतिवर्ष दर्जनों परिवार उजड़ रहे हैं। किताबी कृषि पढ़ाने वाले प्रोफेसरों की तनख्वाहें बढ़ती चली गईं और पंजाब के खेतों में फाके की खर-पतवार लगातार उगती चली गई।

पिछले तीन दशकों के दौरान पंजाब की किसानी विश्व व्यापारियों द्वारा बिछाए जाल में पूरी तरह फंस चुकी है। नए बीज, नई फसलें, अजीबो-गरीब खाद, कीड़े मार दवाएं, भयंकर किस्म के मशीनीकरण तथा आंखों में धूल झोंकने वाले प्रचार ने किसानों का भविष्य अंधेरे में झोंक दिया है। आज पंजाब के अधिकतर गांव मरने के कगार पर हैं। लालच पर केंद्रित किसानी के कारण बेहद समृद्ध लोकजीवन भी छिन्न-भिन्न हो चला है। नए बीजों संग आई गाजर बूटी धरती का कोढ़ बन चुकी है। धान कभी पंजाब की फसल नहीं रहा। न ही यह कभी यहां के लोगों की खुराक रहा। लेकिन पैसे के लालच और दूसरे राज्यों के लिए अधिक चावल बेचने के मोह ने यहां किसानी के फसल चक्र को उलटा चला दिया। नतीजतन धान का उत्पादन इतना बढ़ा कि सड़ने तक लगा।

हरित क्रांति के दौरान और उसके बाद खेती में काम बढ़ने लगे, तो दूसरे राज्यों से मजदूरों से भरी गाड़ियां आने लगीं। नतीजतन मेहनती माना जाने वाला स्थानीय किसान अब मेहनत से भी दूर होने लगा। शराब का नशा बेशक पहले से था ही, उसमें और भी छोटे-बड़े नशे जुड़ गए। ‘हरे इंकलाब’ के पिटे कनस्तर के कारण पंजाब की 70 प्रतिशत भूमि धान की फसल के नीचे दबती चली गई। भयंकर उत्पादन और पैसे की पहली खेप से सबसिडी, सस्ते लोन वगैरह के कारण सब्मर्सिबल और ट्रैक्टरों की कंपनियां सरकारी शरण लेकर हर शहर में बिछ गईं। देखते-देखते 12,644 गांवों में कुछ ही बरसों में साढ़े 15 लाख सब्मर्सिबल धंसा दिए गए। नतीजतन कुछ ही वर्षों में भूजल 20 से 200 फुट नीचे चला गया। अभी पंजाब के भावी मुख्यमंत्री माने जाने वाले सुखबीर बादल ने 180 करोड़ रुपये इसलिए जारी किए हैं, ताकि जिस कोने में सब्मर्सिबल नहीं हैं, वहां भी वह पहुंच जाए।

इस बीच अन्य कई नुकसानों के साथ एक नुकसान यह हुआ है कि चरागाह समाप्त हो गए हैं। बांझ पशुओं के दूध के कारण महिलाओं में भी बांझपन के अनेक मामले सामने आने लगे हैं। चारे के अभाव में पूरा-का पूरा पशुधन सुई के दर्द पर टिक गया है। पंजाब शायद संसार का पहला ऐसा राज्य होगा, जहां से ‘कैंसर एक्सप्रेस’ नाम की रेलगाड़ी चलती है। जिस राजस्थान के साथ पंजाब पानी का एक घड़ा तक बांटने को तैयार नहीं, उसी पंजाब के सभी कैंसर मरीजों को राजस्थान का बीकानेर मुफ्त इलाज देता है। कैंसर के साथ-साथ यहां गुर्दा, जिगर के रोगों की भयावहता भी बढ़ती जा रही है। राज्य में आज ऐसे अनेक गांव हैं, जहां घर में मात्र बुजुर्ग बचे हैं। बच्चे सब विदेश जा चुके हैं। पंजाब प्रदेश के नाम में जुड़े शब्द आब का एक अर्थ पानी तो है ही, लेकिन इसका दूसरा गहरा अर्थ हैः चमक, इज्जत और आबरू। पंजाब अपने नाम का यह असली अर्थ न खो बैठे- आज हमें इसकी चिंता करनी है।
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