आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

जयपुर

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

राजस्थान +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

यह सारा हंगामा इसलिए है

Vinit Narain

Updated Mon, 10 Sep 2012 12:00 PM IST
It is therefore all commotion
चाणक्य के एक सूत्र में कहा गया है कि ‘जो मौन रहते हैं, उनका दूसरों से कभी विवाद नहीं होता।’ पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कामकाज और उनकी छवि के बारे में अमेरिका के प्रतिष्ठित, लेकिन प्रसार और पाठक संख्या के मामले में लड़खड़ाते अखबार वाशिंगटन पोस्ट में हाल में छपे प्रोफाइल पर प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से आई तीखी प्रतिक्रिया इसे चुनौती देती है।
अखबार के भारत स्थित ब्यूरो के चीफ साइमन डेनियर ने अपने लेख इंडियाज साइलेंट प्राइम मिनिस्टर बीकम्स ए ट्रैजिक फिगर (भारत के मौन प्रधानमंत्री बने दयनीय शख्सियत) में मनमोहन सिंह के बारे में लिखा कि एक ईमानदार, सम्मानित, विनम्र और बुद्धिमान टेक्नोक्रेट धीरे-धीरे पूरी तरह से एक अलग ही शख्सियत में तबदील हो गया हैः एक लड़खड़ाता, निष्प्रभावी नौकरशाह, जो गहरे तक घंस चुके भ्रष्ट सरकार का नेतृत्व कर रहा है।

देश के लोग इससे पहले एक और अमेरिकी प्रकाशन, दुनिया भर में अपनी तथ्यपूर्ण रिपोर्टों के लिए सम्मानित समाचार पत्रिका टाइम का मनमोहन सिंह को ‘अंडरएचीवर’ (उम्मीदों से कमतर) करार देना तथा पुराने ब्रिटिश अखबार द इंडिपेंडेंट का ‘कठपुतली’ कहना भूले नहीं हैं। लेकिन यह विडंबना ही है कि शोधपरक रिपोर्टों के लिए जानी जाती एक और ब्रिटिश पत्रिका द इकॉनॉमिस्ट में पिछले साल भर से भारत की खस्ताहाल होती अर्थव्यवस्था और यूपीए-2 के निष्प्रभावी राजकाज तथा प्रधानमंत्री की नाकामी को लेकर छप रहीं तीखी रिपोर्टों पर न प्रधानमंत्री कार्यालय ने ऐसी कड़ी प्रतिक्रिया जताई, न ही भारतीय मीडिया की नजर उन पर पड़ी।

हालांकि पोस्ट के लेख में मनमोहन सिंह की वैसी चुभती आलोचना नहीं है, जैसी भारतीय मीडिया में हो रही है। यहां तक कि पोस्ट के लेख में वैसे करारे तेवर भी नहीं हैं, जैसे एक भारतीय पत्रिका में आठ महीने पहले लेख में थे और जिससे पोस्ट ने प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू और राजनीतिक विश्लेषक रामचंद्र गुहा के यूपीए सरकार की आलोचना वाले उद्धरण लिए हैं।

इसके बावजूद पोस्ट के लेख पर प्रधानमंत्री कार्यालय की कड़वी प्रतिक्रिया अप्रत्याशित और गैरजरूरी है। यह समझना जरूरी है कि विदेशी पत्र-पत्रिकाएं और प्रतिष्ठित वेबसाइटें मनमोहन सिंह और यूपीए-2 की तीखी आलोचना क्यों कर रही हैं? आखिर कल तक यानी यूपीए-1 के जमाने में यही विदेशी मीडिया यूपीए की खुलकर तारीफ कर रहा था। दरअसल इस आलोचना के पीछे वह डर छिपा हुआ है, जो अमेरिका सहित विश्व की दूसरी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के संकट में फंसने से बढ़ रहा है।

कल तक भारत एक मजबूत होती अर्थव्यवस्था था, साढ़े आठ से नौ प्रतिशत की दर से हमारी अर्थव्यवस्था कुलांचें भर रही थी, सरकारी नीतिगत निर्णय तेजी से लिए जा रहे थे, विदेशी निवेशक विभिन्न क्षेत्रों में निवेश के लिए कतार लगाए थे, सस्ते, मेधावी और परिश्रमी मानव श्रम तथा आसान लॉजिस्टिक सपोर्ट की वजह से ऑफशोर जॉब्स भारत में चले आ रहे थे।

जीडीपी और विदेशी मुद्रा भंडार, निर्यात बढ़ रहा था, घरेलू बचत नए रिकॉर्ड बना रही थी, नौकरियों का सृजन हो रहा था, सबसे बढ़कर भ्रष्टाचार के किस्से कम हो चले थे। 2008 की विश्वव्यापी मंदी से अब तक उबर न पाए विकसित देशों को एशिया में सबसे ज्यादा उम्मीद भारत से थी कि मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री-राजनेता की अगुआई में भारत न केवल अपनी किस्मत चमकाएगा, बल्कि दुनिया की बदहाली दूर करने के उपायों को भी परवाज लगाएगा। लेकिन भ्रष्टाचार के दिन-ब-दिन सामने आते कारनामों, यूपीए नेताओं की उनमें भूमिका और सबसे बढ़कर घोटालों तथा उनके दोषियों पर कार्रवाई करने में मनमोहन सिंह सरकार की नाकामी से एकाएक ही सब कुछ बदल गया।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध तेज हो रहे जनरोष, नौ राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में कांग्रेस की किरकिरी और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की जमीनी स्तर पर नाकामी से मनमोहन सिंह सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। सुधारों की प्रक्रिया, अहम नीतिगत निर्णयों से लेकर सामान्य राजकाज के फैसले तक रुक गए। कोयला खदानों के आवंटन पर बवाल और संसद ठप होने से मनमोहन सिंह सरकार की नाकामी के बचाव की कोई दलील नहीं बची। तो क्या मीडिया इसे रिपोर्ट भी न करे?

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने से भारत में विदेशी मीडिया की दिलचस्पी पहले से है। मुश्किल यह है कि सरकारें विदेशी मीडिया को अपना शत्रु ही मानती हैं। सरकार और नेताओं को तो देसी मीडिया का ही सवाल करना पसंद नहीं, तब विदेशी मीडिया किस खेत की मूली है? जब आप उन्हें ब्रीफ नहीं करेंगे, इंटरव्यू, मुलाकात के उनके अनुरोधों को रद्दी के टोकरे में फेंकेंगे, तो हर मीडिया की तरह विदेशी मीडिया भी रिसर्च तथा सेकेंडरी सोर्सेज से रिपोर्ट तैयार कर लेता है।

पोस्ट ने भी यही किया। फिर उसके ब्यूरो चीफ को भारत की बिगड़ती हालत समझने के लिए जंतर-मंतर से ज्यादा दूर जाने की जरूरत भी नहीं थी। बेहतर होता, इस रिपोर्ट को प्रधानमंत्री कार्यालय नजरंदाज कर देता। लेकिन उसकी उग्र प्रतिक्रिया विदेशी निवेशकों और उद्यमियों को नकारात्मक संदेश देती है। नीतियों-निर्णयों के मामले में ठोस सफलताओं और भ्रष्टाचार के प्रकरणों में सख्त कार्रवाई से ही मीडिया में सरकार की आलोचना कम हो सकती है।
  • कैसा लगा
Write a Comment | View Comments

Browse By Tags

स्पॉटलाइट

इंस्टाग्राम की नई क्वीन बनीं कैटरीना, एक दिन में हुए इतने फॉलोअर्स

  • शनिवार, 29 अप्रैल 2017
  • +

अधूरी रह गई विनोद खन्ना की आखिरी ख्वाहिश...

  • शनिवार, 29 अप्रैल 2017
  • +

बाहुबली ने बॉक्स ऑफिस में रचा इतिहास, खान तिकड़ी के ये रहे कमाई के रिकॉर्ड?

  • शनिवार, 29 अप्रैल 2017
  • +

इस मंदिर में पुरुषों का प्रवेश है निषेध, जानें कैसे कर पाते हैं पूजा

  • शनिवार, 29 अप्रैल 2017
  • +

अपडेटेड रेंज रोवर अगले साल तक होगी लॉन्च

  • शनिवार, 29 अप्रैल 2017
  • +

Most Read

बुद्धिजीवियों की चुप्पी

Silence of intellectuals
  • गुरुवार, 27 अप्रैल 2017
  • +

एक राष्ट्र, एक कर, एक बाजार

A nation, a tax, a market
  • शनिवार, 29 अप्रैल 2017
  • +

एक बार फिर बस्तर में

Once again in Bastar
  • मंगलवार, 25 अप्रैल 2017
  • +

बेकसूर नहीं हैं शरीफ

Sharif is not innocent
  • रविवार, 23 अप्रैल 2017
  • +

अर्धसैनिक बलों की मजबूरियां

Compulsions of paramilitary forces
  • मंगलवार, 25 अप्रैल 2017
  • +

राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की परीक्षा

Examination of opposition in presidential election
  • रविवार, 23 अप्रैल 2017
  • +
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!
Top