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सार्वजनिक सेवा की सीमाएं

Vinit Narain

Updated Sat, 08 Sep 2012 12:00 PM IST
कोयला खदानों के आवंटन से संबंधित कैग की रिपोर्ट पर घमासान जारी है। कांग्रेस और भाजपा जहां भावी राजनीतिक जनाधार के लिए संघर्षरत हैं, वहीं क्षेत्रीय दलों समेत सभी पार्टियां अधिकतम राजनीतिक लाभ के लिए अपनी योजना बना रही हैं। ऐसा लगता है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में गतिरोध आ गया है, क्योंकि कोई भी पहल या एक छोटा-सा फैसला भी कैग, सीवीसी, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवी संगठनों का मामला बन जाता है।
अपनी जिम्मेदारी दूसरे पर टालने और फैसले को दबाकर रखना ही शासन के सभी तीनों अंगों में सुरक्षित उपाय बन गया है। हम 'बनाना गणतंत्र' नहीं हैं, पर दुर्भाग्य से हम उसी स्थिति की तरफ बढ़ रहे हैं। इस गड़बड़ी के लिए हम सब जिम्मेदार हैं। फौरी तौर पर भले ही एक की कीमत पर दूसरा फायदा उठा ले, लेकिन दीर्घावधि में उसका खामियाजा सबको भुगतना पड़ेगा।

कोल ब्लॉक आवंटन मामले में सीबीआई ने कार्रवाई शुरू कर दी है और राजनेताओं से जुड़ी कई कंपनियों पर छापे पड़ रहे हैं और मुकदमे दर्ज किए गए हैं। इसमें कई लोगों पर मुकदमा चलेगा और बेजा लाभ ले चुके विशिष्ट लोगों की सूची बढ़ती जाएगी। मौजूदा माहौल में गलत में से सही को अलग करना मुश्किल है। राजनीति को व्यापार बना देने का ही नतीजा है कि कोल ब्लॉक आवंटन विवाद के कारण समूचा ऊर्जा क्षेत्र ठप हो सकता है। तर्क के लिए किसी के पास समय नहीं है। स्थिति जिस तरह भयावह बन रही है, उसमें व्यवसायियों को राजनीति में आने या निर्वाचित सांसदों को व्यावसायिक गतिविधियों में शामिल होने से रोकने के बारे में सोचने का समय आ गया है।

जहां तक मेरी बात है, तो लगभग 50 वर्षों तक काम करने के बाद मेरी चल संपत्ति एक करोड़ से भी कम है। इनमें से आधी मुझे माता-पिता से विरासत में मिली है। हालांकि मैं आय से अधिक संपत्ति मामले से जुड़ा हुआ नहीं है, इसके बावजूद मेरे लिए या किसी और के लिए भी यह उचित नहीं कि वह इस मुद्दे पर कोई निर्णय दे, क्योंकि कइयों का अपना व्यवसाय हो सकता है, कइयों ने पैतृक संपत्ति अर्जित की हो सकती है या नई कीमत पर पुरानी संपत्ति बेचने का उन्हें लाभ मिला हो सकता है। लेकिन इतना तो कहना ही चाहिए कि सार्वजनिक सेवा से जुड़े किसी भी व्यक्ति को सरकार से वह फायदा नहीं उठाना चाहिए, जो आम आदमी के लिए उपलब्ध नहीं है। यही सिद्धांत खदानों और अन्य परिसंपत्तियों पर भी लागू होना चाहिए।

हमने रियल एस्टेट क्षेत्र और दूरसंचार के बाद अब खनन क्षेत्र में भारी घोटाला देखा है। बल्कि यह घोटाला रियल एस्टेट और दूरसंचार घोटाले से ज्यादा बड़ा हो सकता है। दुखद यह है कि प्रभावी इलाज के अभाव में पूरी व्यवस्था में फैल चुके इस 'वायरस' के लिए विभिन्न दलों के नेता जिम्मेदार हैं। भाजपा के हमले के जवाब में कांग्रेस का तर्क है कि 1993 से 2003 के बीच की अवधि की भी जांच हो। उसकी यह मांग उचित है।

सचाई यह है कि राजनेताओं पर उनकी अपनी पार्टी का नियंत्रण नहीं है। वित्तीय माफिया गतिविधियों ने कांग्रेस एवं भाजपा, दोनों को प्रभावित किया है। और यह सब तब हो रहा है, जब दोनों दलों के वरिष्ठ नेताओं की ईमानदारी पर कोई शक नहीं है। यही बात नौकरशाही एवं न्यायपालिक के बारे में कही जा सकती है। लेकिन शासन का कोई भी अंग क्या निचले स्तर पर भ्रष्टाचार या उगाही को नियंत्रित करने में सक्षम है? हमारे पास न तो प्रतिभा की कमी है और न ही अच्छे लोगों की, लेकिन सभी दमनकारी समाज के डर से हैरान होकर निष्क्रिय रह जाते हैं।

नतीजतन व्यवस्था में एक गतिरोध आ गया है। हम एक ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं कि इस पतन को रोके बगैर आगे नहीं बढ़ सकते। हम सभी अनजान बने रहते हैं और आदतन छोटी चीजों को बड़ा करके दिखाने के अभ्यस्त बन गए हैं। हमारी राजनीतिक व्यवस्था अपंग बन चुकी है, इसे दोहराने की जरूरत नहीं है। सीबीआई कोई काम सही नहीं कर सकती, और कैग अपनी हर रिपोर्ट को सरकार के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। जांच की व्यवस्था, बहस और कानून की प्रक्रिया पूरी करने के लिए समय नहीं है। हमने सेना में गड़बड़ियां देखी हैं। पूर्व थलसेनाध्यक्ष को पिछले दिनों बाबा रामदेव के मंच पर बैठा देखा गया है। अब तो उच्च न्यायपालिका के दखल से ही व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त होने से बचाया जा सकता है।

हमारी सभी संस्थाएं निशाने पर हैं। हम अराजकता से खेल रहे हैं और इस स्थिति में कई लोग अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर रहे हैं। व्यवस्था इस नकारात्मकता को सुधारने में असमर्थ है। हमने जो भी अच्छी चीज विकसित की, उसका दुरुपयोग किया जा रहा है। इसका एक बेहतर उदाहरण सूचना का अधिकार कानून है। घटनाएं हमेशा फैसलों से आगे निकल जाती हैं। इन स्थितियों में आगे क्या होगा, उसके बारे में मैं भविष्यवाणी नहीं करना चाहता। मेरा स्पष्ट मानना है कि न्यायिक जवाबदेही जरूरी है, लेकिन मौजूदा हालात में इस पर विचार करना भी समझदारी नहीं होगा। कोयला आवंटन के बाद दिल्ली हवाई अड्डे से संबंधित कैग रिपोर्ट पर बात होगी और फिर सुपर पावर स्टेशन रिपोर्ट पर। हमें एक बार फिर स्थिति को नियंत्रित करना होगा।
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