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उनके सपनों को भी लगे पंख

Vinit Narain

Updated Sun, 02 Sep 2012 12:00 PM IST
तकरीबन एक दशक पहले डोपिंग का आरोप लगने पर एथलीट सुनीता रानी से 2002 के बुसान में हुए एशियाड में उसे मिले स्वर्ण और कांस्य पदक छीन लिए गए थे। हालांकि बाद में उस पर लगे आरोप गलत साबित हुए और उसे पदक भी लौटा दिए गए। उस दौर में जो बात खुलकर सामने नहीं आ सकी थी, वह यह कि वह मासिक धर्म से पीड़ित थी और उसने कुछ दवाएं ली थीं। वास्तव में किसी भी लड़की के जीवन का यह ऐसा पक्ष है, जिस पर आज भी खुलकर बात नहीं की जाती। इससे जुड़ी वर्जनाओं और रूढ़ियों के कारण ग्रामीण इलाकों में तो लड़कियों की पढ़ाई तक बीच में छूट जाती है।
मगर चेन्नई से दक्षिण-पश्चिम की तरफ साढ़े तीन सौ किमी दूर पिछड़े कृष्णागिरि जिले के एमसीपल्ली गांव के एक सरकारी स्कूल में आकर यह धारणा टूट जाती है, जहां सैनेटरी नेपकिन से लेकर शौचालय में गंदे कपड़े बदलने तक की विशेष व्यवस्था की गई है। यही नहीं, शौचालय के साथ ही एक इंसिनरेटर (भट्टी) लगा हुआ है, जिसमें गंदे पैड और अन्य गंदी सामग्री को नष्ट कर दिया जाता है। स्कूल की विज्ञान शिक्षिका के सेल्वारानी कहती हैं, 'इससे लड़कियों में विश्वास जागा है और वे अब मासिक धर्म को 'अभिशाप' नहीं मानतीं।'

देश के दूसरे हिस्सों की तरह दक्षिण भारत में भी सांस्कृतिक रूप से मासिक धर्म को गंदी चीज समझा जाता है। एमसीपल्ली स्कूल के प्रधान अध्यापक जे सुंदरदास बताते हैं कि कुछ वर्ष पहले तक तो आठवीं और नौंवी कक्षा की दो तिहाई लड़कियां मासिक धर्म के समय स्कूल ही नहीं आती थीं और फिर धीरे-धीरे उनमें से अनेक लड़कियों की पढ़ाई छूट जाती थी। तमिलनाडु में लड़कियों के ड्रॉप आउट होने की यह एक बड़ी वजह रही है।

मगर अब स्थिति बेहतर हुई है, क्योंकि स्कूल के भीतर ही मासिक धर्म से पीड़ित लड़कियों के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। सर्वशिक्षा अभियान तमिलनाडु और यूनिसेफ ने मिलकर 2009 में कृष्णागिरि के आठ हाई स्कूलों में मासिक धर्म से जुड़ी सफाई और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता अभियान शुरू किया। एमसीपल्ली गर्ल्स हाई स्कूल भी उन्हीं में से एक है। कृष्णागिरि जिला मुख्यालय से चालीस किमी दूर एमसीपल्ली गांव का यह स्कूल उस धारणा के खिलाफ लड़ाई लड़ते दिख रहा है, जिससे देश की 35 करोड़ से ज्यादा महिलाएं जूझ रही हैं।

सेल्वारानी बताती हैं कि शुरुआत में यह मुश्किल आई कि लड़कियों को कैसे सैनेटरी नेपकिन के बारे में बताया जाए, क्योंकि उनकी माताएं इसके लिए तैयार नहीं थीं। इसके लिए कोयंबटूर की एक कंपनी की मदद ली गई, जिसने खास तरह के सैनेटरी नेपकिन और वैंडिंग मशीन तैयार की हैं। इस मशीन में लड़कियां एक या दो रुपये के सिक्के डाल देती हैं और उसमें से नेपकिन बाहर निकल आता है।

वास्तव में देश में सैनेटरी नेपकिन इस्तेमाल करने का चलन ही एकदम नया है। बाजार से जुड़ी एसी नीलसन के ताजा सर्वेक्षण पर नजर डालें, तो आज भी देश की महज 12 फीसदी महिलाएं ही मासिक धर्म के समय सैनेटरी नेपकिन का इस्तेमाल करती हैं, जबकि इंडोनेशिया जैसे देश में भी 85 फीसदी महिलाएं सैनेटरी नेपकिन इस्तेमाल करती हैं और चीन में 64 फीसदी।

देश की बाकी की 88 फीसदी महिलाएं पुराने कपड़ों का ही इस्तेमाल करती हैं, जिनसे बीमारियां और गंदगी फैलने की आशंका होती है। हालांकि मुक्त बाजार व्यवस्था में लड़कियों को 'आजादी' का सपना दिखाने वाले सैनेटरी नेपकिन के टीवी में आने वाले विज्ञापनों ने इस कारोबार को बढ़ाने में खासा मदद की है।

जे सुंदरदास बताते हैं कि मामला सिर्फ सैनेटरी नेपकिन की व्यवस्था या साफ-सफाई तक ही सीमित नहीं है। उन खास दिनों में लड़कियों को सेहत का भी खास ध्यान रखना होता है। स्कूल की शिक्षिकाओं और कुछ लड़कियों के ही कुछ समूह बनाए गए हैं, जो अलग-अलग कक्षाओं के हिसाब से लड़कियों के मासिक चक्र का रिकॉर्ड रखते हैं। लिहाजा यदि किसी लड़की के चक्र में अनियमितता पाई जाती है या फिर किसी अन्य तरह की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कत आती है, तो उसे डॉक्टर को दिखाया जाता है।

इस परियोजना से जुड़े वाई के बाबू बताते हैं कि मुख्यमंत्री जे जयललिता ने नवंबर 2011 में प्रदेश की 10 से 19 वर्ष की सभी लड़कियों, नव प्रसूताओं और महिला कैदियों को मुफ्त सैनेटरी नेपकिन दिए जाने की योजना घोषित की थी, पर इस पर अभी पूरी तरह अमल नहीं हो पाया है। मगर हर अच्छी शुरुआत जरूरी नहीं कि सरकारी पहल से ही हो, इसके लिए एमसीपल्ली जैसे छोटे गांव से भी की जा सकती है, जहां कि लड़कियां अब सचमुच 'आजादी' महसूस कर रही हैं।
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