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जय हो मोबाइल की

Vinit Narain

Updated Thu, 23 Aug 2012 12:00 PM IST
एक समय राजधानी की बसों में सफर रोते-पीटते, एक दूसरे को कोसते हुए या लड़ते-झगड़ते कटता था। अब तो लंबा सफर भी कब बीत जाता है, पता नहीं चलता। इसके दो कारण हैं। एक तो दिल्ली की सड़कों से ब्लू लाइन बसों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है और उनकी जगह हरी, लाल और संतरे रंगों वाली बसों ने ले ली है, जिनकी सीट पर बैठने पर यह डर नहीं सताता कि कब ओवरटेक करते हुए ड्राइवर हमारा टाइम ओवर कर देगा। दूसरे, अब सबके पास मोबाइल फोन है।
अगर आप बस से रोजाना सफर करते हैं, तो देखा होगा कि सुबह दफ्तर जाते समय बसों में अलग सीन रहता है, तो आते समय कुछ और। महिलाओं के लिए सुबह ऑफिस जाने का वक्त अकसर अपने मायके वालों से बात करने का रहता है। चूंकि बच्चे स्कूल में होते हैं और पति पहले ही दफ्तर निकल लिए होते हैं, ऐसे में महिलाएं मायके में सभी रिश्तेदारों की खैर-खबर लेने के बाद या तो अपनी नई खरीदारी के बारे में बात करेंगी या सास-ननद के गिले-शिकवे ले बैठेंगी।

मायके वालों से बात कर मन की भड़ास निकल जाएगी और मन भी हलका हो जाएगा। शाम को लौटते समय यही महिलाएं बार-बार घर पर फोन कर पूछती रहेंगी, बेटा, पढ़ रहे हो या नहीं? मुझे टीवी की आवाज सुनाई दे रही है, उसे तुरंत बंद कर पढ़ने बैठ जाओ। मां तो मोबाइल पर बात कर तसल्ली कर लेती हैं, पर बच्चों के लिए सेलफोन किसी आफत से कम नहीं, जो उन्हें चैन से टीवी भी नहीं देखने देता।

बस में जवान लड़के-लड़कियों की तो दुनिया ही कुछ और है। भले ही कितनी भी भीड़ हो, उन पर किसी चीज़ का असर ही नहीं पड़ता। उनकी प्यार भरी गुटरगूं बिना किसी विघ्न के जारी रहेगी। और आवाज तो इतनी धीमी होगी कि आप उनसे सट जाने के बाद भी एक शब्द तक नहीं सुन सकते। अगर वे किसी से बात नहीं कर रहे, तो मोबाइल पर संगीत में मस्त रहेंगे।

एक रिटायर्ड बुजुर्ग का कहना था, भला हो दिल्ली सरकार का, जिसने हम लोगों के लिए डेढ़ सौ रुपये में महीने भर का पास बनवा दिया है। हम बस में मजे से बैठकर मोबाइल कल्चर का आनंद उठाते हैं, वरना घर में तो हमारी औकात शेल्फ पर धूल भरे उस पुराने डेकोरेशन पीस की तरह हो गई है, जिसे न फेंकते बनता है, न रखते। जय हो मोबाइल की। तेज रफ्तार जिंदगी में तेरा ही सहारा है।
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