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न्यायपालिका के निशाने पर सरकार

Vinit Narain

Updated Sat, 18 Aug 2012 12:00 PM IST
judiciary the government target
पाकिस्तान में शीर्ष अदालत और सरकार में दिन-ब-दिन बढ़ते टकराव से एक बार फिर राजनीतिक संकट गहराता नजर आ रहा है। शीर्ष अदालत ने प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ को राष्ट्रपति जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले खोलने के लिए आठ अगस्त तक स्विस सरकार को पत्र लिखने की अंतिम तिथि दी थी, जिस पर अमल नहीं हुआ। अब इसे बढ़ाकर 27 अगस्त कर दिया गया है।
दरअसल सरकार चाहती है कि इस मामले को अगले साल शुरू होने वाले आम चुनाव तक लटकाया जाए, ताकि वह जरदारी मामले में अदालत के सख्त रवैये को उभारकर मतदाताओं का विश्वास जीत सके। बताया यह भी जा रहा है कि स्विट्जरलैंड में जरदारी और स्वर्गीय बेनजीर भुट्टो के खिलाफ इस मुकदमे की सीमा अगले महीने खत्म हो रही है।

इसके बाद किसी पत्र के लिखे जाने से भी वहां कोई कार्रवाई नहीं होगी। इसलिए सरकार इस मामले को टालना चाहती है, जबकि शीर्ष अदालत इस मामले में अब और समय नहीं देना चाहती, क्योंकि यह मामला वर्ष 2009 से चल रहा है। तथ्य यह भी है कि पूर्व प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी जाते-जाते कह गए थे कि शीर्ष अदालत जितने भी प्रधानमंत्रियों को घर वापस भेज दे, लेकिन स्विस सरकार को कोई भी प्रधानमंत्री खत नहीं लिखेगा।

पाक के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुकदमे की आठ अगस्त को सुनवाई के बाद प्रधानमंत्री को अदालत के सामने निजी तौर पर 27 अगस्त को पेश होने को कहा है। अदालत ने यह भी कहा है कि 27 अगस्त तक इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई, तो वह खुद कार्रवाई करेगी। वहीं अदालत के सख्त तेवर देखकर सलाहकारों ने सरकार को कहा है कि प्रधानमंत्री अदालत के समक्ष पेश न हों।

दरअसल पाक सरकार ने आठ अगस्त की तारीख आने से पहले ही प्रधानमंत्री को बचाने का रास्ता तलाश कर लिया था और संसद से अदालत की अवमानना का नया कानून 2012 पास करा लिया था। यह काम इतनी तेजी और हड़बड़ी में किया गया कि इसमें काफी झोल रह गए। इस कानून के खिलाफ 27 मुकदमे दर्ज हो गए। अदालत ने भी बड़ी तेजी के साथ इस मुकदमे की सुनवाई की और तुरंत फैसला सुनाया कि संसद का स्वीकृत कानून संविधान के अनुच्छेद 25 के खिलाफ है, यानी गैर सांविधानिक है।

फैसले में यह भी कहा गया कि इस कानून में राष्ट्रपति और दूसरे मंत्रियों को जो छूट दी गई है, वह भी संविधान-विरोधी है। साथ ही उन्हें इस बात की जो छूट दी गई है कि अगर वह चाहें, तो उचित शब्दों में अदालती फैसलों की नुकताचीनी कर सकते हैं, वह भी सरासर गलत है। इस कानून के जरिये न्यायाधीशों की हैसियत कम करने की भी कोशिश की गई है। फैसले में यह भी कहा गया कि अदालत की अवमानना का पिछला कानून 2003 ही प्रभावी रहेगा, जिसके तहत गिलानी को दोषी करार दिया गया था। जबकि अटॉर्नी जनरल ने दलील देते हुए यह कहा कि निजी हैसियत में किसी को भी कोई छूट नहीं दी गई।

अब समय आ गया है कि अदालत कार्यपालिका के हाथ मजबूत करने के लिए उसके साथ मिलकर चले। इस तरह पाकिस्तान में एक नया झगड़ा शुरू हो गया है कि संसद, न्यायपालिका और संविधान में कौन सर्वप्रिय है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी के अनुसार, कोई भी नागरिक कानून से परे नहीं है। यह इशारा राष्ट्रपति जरदारी की तरफ है, क्योंकि कानून बनवाने में उनकी मुख्य भूमिका रही, जबकि कई सहयोगी पार्टियां इस कानून के खिलाफ थीं।

देखना यह है कि पाकिस्तान में न्यायपालिका और सरकार में जारी टकराव अगले कुछ दिनों में क्या शक्ल लेता है। ज्यादा उम्मीद यही है कि अगर शीर्ष अदालत के हुक्म को माना न गया, तो प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ को भी पूर्व प्रधानमंत्री यूसुफ गिलानी की तरह अयोग्य करार दे दिया जाएगा और उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ेगा। इस तरह पाकिस्तान सरकार को एक और शहादत देनी होगी। इस टकराव से सर्वाधिक नुकसान आम जनता को हो रहा है, क्योंकि उसकी समस्याओं को हल करने के लिए सरकार के पास समय नहीं है।
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