आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

जयपुर

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

राजस्थान +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

अब भ्रष्टाचार की अनदेखी मुश्किल

Vinit Narain

Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
corruption is now difficult to ignore
आजादी की पैंसठवीं वर्षगांठ पर देश एक विशिष्ट दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ निर्वाचन व्यवस्था में सराहनीय कानूनी और व्यवस्थागत सुधार दिखाई देते हैं, तो दूसरी तरफ वास्तविक लोकतंत्र की आस डूबती दिखाई दे रही है। शहरी जीवन तो तेजी से उन्नत होता दिख रहा है, लेकिन विशेष रूप से ग्रामीण आबादी, आजादी के 65 वर्ष बाद भी पेयजल, बिजली, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं से महरूम है। यह स्थिति देश में दो तरह की नागरिकता की द्योतक है। हालांकि जब देश आजाद हुआ था, तो प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस सामाजिक विषमता के आसार देख लिए थे।
उन्होंने कहा भी था कि राजनीतिक जीवन में भले ही समानता मिल गई है, पर आर्थिक और सामाजिक विषमता खतरनाक हो सकती है। इस सोच में थोड़ा संशोधन कर कहा जा सकता है कि सामाजिक और आर्थिक असमानता में अब भौगोलिक क्षेत्र की विषमता भी जुड़ गई है। अगर ऐसा नहीं होता, तो गांवों में विस्थापनों की बाढ़ नहीं दिखती, जिसमें बहकर लोग ग्रामीण जीवन को छोड़कर शहरी इलाकों में निचले पायदान पर अपना जीवन बसर करने को मजबूर हैं।

ऐसी ही विडंबनाओं के बीच गत दो वर्षों में जो मुद्दा ज्यादा तेजी से उभरा है, वह है भ्रष्टाचार। सिविल सोसाइटी और गेरुआ-भगवा लगनेवाले संगठन भी लगातार इस मुद्दे पर मुखर हुए हैं और जनसभा, मोरचा, आमरण अनशन कर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। मीडिया की बढ़ती पकड़ के कारण ऐसे मुद्दों का जनसंचार भी तीव्र गति से हो रहा है।

भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर गरीब से गरीब व्यक्ति भी इस आस में आंदोलन कर बैठता है कि अब थाने में उसकी सुनवाई होगी, ग्रामीण इलाकों के अस्पतालों में डॉक्टरों की सुविधा होगी, शिक्षक उनके बच्चों को पढ़ाने आएंगे, प्रशासनिक जड़ता टूटेगी और प्रखंड कार्यालयों के चक्कर लगाने में कट रही उनकी जिंदगी बरबाद नहीं होगी। उम्मीदों की बढ़ती इस आस में उसे जनवितरण व्यवस्था (पीडीएस) के तहत सस्ते या मुफ्त अनाज का वायदा भी किया जाता है, और यह भरोसा दिया जाता है कि राज्य ऐसी व्यवस्था में उसका साथी बनेगा, जहां मुनाफाखोरी नहीं होगी, लूट-खसोट पर अंकुश लगेगा। लेकिन अगर सरकार या संस्थाओं के रवैये को देखें, तो यह आस का सूरज भी डूबता दिख रहा है।

दरअसल, अलग-अलग राज्यों में भ्रष्टाचार का तरीका अलग-अलग है। दक्षिण के राज्यों में जहां रेड्डी बंधुओं ने कोयला खदान के माध्यम से काला धन एकत्र किया, वहीं बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में राशन के लिए आए धन की बंदरबाट हुई। इस तरह भ्रष्टाचार के किस आयाम पर कहां जनांदोलन होंगे और किन मुद्दों से जनजीवन का जुड़ाव है, इस पर भी राज्यों में भिन्नता है, जो स्वाभाविक है। पर इन सब बातों से यह तो तय है कि आम जनता किसी भी कीमत पर भ्रष्टाचार से निजात पाना चाहती है।

अन्ना हजारे और रामदेव के आंदोलन के परिदृश्य में देखें, तो ऐसा माना जा सकता है कि 1990 और 2000 के दशक में सुर्खियों में आए मंडल और कमंडल मुद्दे की तरह अभी भ्रष्टाचार ही ऐसा मुद्दा है, जिसके खिलाफ जनमानस का सैलाब उमड़ रहा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि मंडल और कमंडलवादी राजनीतिक दल अब भ्रष्टाचार-विरोधी ऐसी कोशिशों की अनदेखी नहीं कर सकते।
दुखद है कि इन तमाम राजनीतिक परिवर्तन के बीच जिस किसी एक तबके की बात सामने नहीं आई, वह है महिलाएं। भ्रष्टाचार के मामलों में सबसे ज्यादा भुक्तभोगी होने के बाद भी कोई उनकी सुध लेने को तैयार नहीं।

महिलाएं राशन की दुकानों के चक्कर लगाती हैं, जहां भ्रष्टाचार का बोलबाला है। पुलिस थानों में वह सुरक्षित नहीं मानी जातीं और स्वास्थ्य के मोरचों पर भी उन्हें पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल रहीं। दुर्भाग्य की बात है कि घर-परिवार और जीवन-यापन का बोझ ढोने वाली महिलाओं की दशा की तरफ न तो अन्ना हजारे, और न ही बाबा रामदेव मुखरित हुए। यह तय है कि कानून में सुधार और संस्थागत परिवर्तन हुए बिना महिलाओं की स्थिति सुधरने वाली नहीं।

अगर ऐसा हुआ, तो नेतृत्व की भूमिका में ही महिलाओं की अच्छी-खासी उपस्थिति देखी जाएगी। हालिया वर्षों में पंचायत में महिला नेतृत्व का बढ़ना यही बताता है कि सांविधानिक संरक्षण मिले, तो महिला नेतृत्वकारी भूमिका का आसानी से निर्वहन कर सकती हैं। इस लिहाज से देखें, तो ऐसी ही योजना और संरक्षण लोकसभा अथवा राज्यसभा में भी महिलाओं को मिलनी चाहिए।

विडंबनाओं के इस परिवेश में देश की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय छवि में इजाफा करने वाली महिला के रूप में मैरी कॉम उभरी हैं। वह ऐसे राज्य से हैं, जो मुख्यधारा से अलग-थलग है, इसके बावजूद व्यक्तिगत श्रम और पारिवारिक सहयोग की बदौलत वह ओलंपिक पदक की विजेता बनीं। ऐसे ही जज्बों ने इस देश को बनाया-संवारा है।
  • कैसा लगा
Write a Comment | View Comments

Browse By Tags

स्पॉटलाइट

सुभाष घई की 'हीरोइन' ने किया 38 साल बड़े हीरो के साथ लवमेकिंग सीन, तस्वीर वायरल

  • मंगलवार, 28 मार्च 2017
  • +

आशा पारेख की बायोग्राफी लॉन्च करेंगे सलमान खान

  • मंगलवार, 28 मार्च 2017
  • +

इन्वर्टिस के मेधावी छात्र वैभव सिंह बने आई.ए.एस

  • मंगलवार, 28 मार्च 2017
  • +

ये हैं जियो के सभी बैलेंस पता करने वाले USSD कोड

  • मंगलवार, 28 मार्च 2017
  • +

फिल्म 'स्पाइडर मैन होमकमिंग' का टीजर रिलीज

  • मंगलवार, 28 मार्च 2017
  • +

Most Read

मिल-बैठकर सुलझाएं यह विवाद

Settle this dispute by dialough
  • मंगलवार, 28 मार्च 2017
  • +

ईवीएम पर संदेह करने वाले

Skeptics on EVMs
  • गुरुवार, 23 मार्च 2017
  • +

कुदरती खेती में ही सबकी भलाई

Natural agriculture is beneficial to all
  • रविवार, 26 मार्च 2017
  • +

स्कूलों को रसोईघर न बनने दें

Do not let schools become kitchen
  • मंगलवार, 28 मार्च 2017
  • +

उत्तर प्रदेश को सर्वोत्तम बनाने का क्षण

The moment to make Uttar Pradesh the best
  • बुधवार, 22 मार्च 2017
  • +

नदियां भी नागरिक होती हैं

Rivers are also citizens
  • मंगलवार, 28 मार्च 2017
  • +
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!
Top