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जारी है न्यायिक सुधार का काम

Vinit Narain

Updated Sat, 11 Aug 2012 12:00 PM IST
improvement for judicial reform continues
न्यायिक व्यवस्था में सुधार जितना जरूरी मुद्दा है, इस पर उतना ही विलंब होता गया है। इस मसले पर केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद से पीयूष पांडेय की बातचीत-
देश के दूर-दराज इलाकों के लोगों को राहत देने के लिए क्या सरकार सर्वोच्च न्यायालय के विकेंद्रीकरण पर विचार कर रही है?
यह प्रश्न लंबे समय से उठ रहा है, पर सरकार फिलहाल इस बारे में कुछ नहीं सोच रही। हां, पूर्वोत्तर की परेशानी को ध्यान में रखते हुए मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा में हाई कोर्ट की बेंच जरूर स्थापित की जाएगी। सरकार न्यायपालिका में लंबित मामलों के तेजी से निपटारे, जजों की नियुक्ति और न्यायिक सेवाओं की व्यवस्था सुधारने के लिए तत्पर है। जस्टिस डेलिवरी सिस्टम के तहत मामलों को तेजी से निपटाने की पहल की जा चुकी है। गत वर्ष देश भर में पांच लाख मामलों को निपटाया गया है और हर साल करीब छह लाख मुकदमे निपटाने का लक्ष्य रखा गया है।

लंबित मामलों की फेहरिस्त को निपटाने और जजों की कमी को पूरा करने के लिए क्या कानून मंत्रालय की ओर से कोई कदम उठाया गया है?
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए चयन प्रक्रिया में बदलाव के लिए कदम उठाया जा रहा है। इसमें मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों की सलाह ली गई है। अभी तक कॉलैजियम सिस्टम के जरिये जजों की नियुक्ति होती है, जिसमें सरकार न्यायपालिका की सिफारिश एक बार लौटा सकती हैं। इसमें बदलाव के बाद जजों की नियुक्तियां पारदर्शी तरीके से तेजी से की जाएंगी।

क्या सरकार की ओर से न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति के लिए कोई अलग व्यवस्था कायम की जाएगी, जो आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति जैसी ही होगी?
भारतीय न्यायिक सेवाओं की व्यवस्था के मसले पर ज्यादातर राज्यों ने सहमति जताई है। न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति के लिए एक व्यवस्था कायम किया जाना बहुत जरूरी है। अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। लेकिन भविष्य में यह व्यवस्था कायम होगी और इसका सबसे ज्यादा लाभ कानूनी शिक्षा हासिल करने वालों को मिलेगा।

महिलाओं के तलाक संबंधी कानून में सरकार संशोधन करने जा रही है, क्या यह बदलाव उनके हितों की रक्षा के लिए है?
दरअसल मौजूदा समय में कई ऐसी तकनीकी अड़चनें हैं, जिनकी वजह से महिलाओं को तलाक लेने में बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है। इस संबंध में सरकार के पास आई सिफारिशों को ध्यान में रखकर संशोधन करने का फैसला लिया गया है। उम्मीद है कि इससे महिलाओं को उन परेशानियों से भी निजात मिलेगी, जो कानूनी पेचीदगियों के चलते उन्हें मजबूरन झेलनी पड़ती थीं।

देश भर की अदालतों को कंप्यूटरीकृत करने के लक्ष्य में क्या सरकार पिछड़ गई है?
बेशक इसकी रफ्तार थोड़ी धीमी हो गई है। अभी तक 12,500 में से 8,500 अदालतों को ही ई-कोर्ट में तबदील किया जा सका है। कोर्ट फीस के भुगतान में ई-पेंमेट की व्यवस्था के लिए मुंबई और दिल्ली में संशोधन किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट स्थित सरकार के कार्यालय को भी डिजिटलाइज किया जाएगा।

लोकपाल कानून बनने में कितना समय और लगेगा?
लोकपाल के मुद्दे पर सरकार गंभीर और प्रतिबद्ध है। लेकिन कानून बनाए जाने की प्रक्रिया में समय लगता है, इससे हर कोई वाकिफ है। लोकसभा में लोकपाल विधेयक पास हो चुका है और अब राज्यसभा की सेलेक्ट कमिटी के पास है। समिति के विचार करने के बाद उच्च सदन से हरी झंडी मिलने की देरी है।
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