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निजता की कितनी ऊंची दीवार

Vinit Narain

Updated Tue, 31 Jul 2012 12:00 PM IST
Congress Leader N D Tiwari DNA Probes Privacy Rohit Shekhar
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी जब एक युवक द्वारा पिता होने का दावा करने के प्रश्न पर विभिन्न न्यायिक मौकों पर अड़ते चले गए, तो अंत में डीएनए जांच के आधार पर पितृत्व निर्धारित किया गया। उच्च न्यायालय ने उन्हें दावा करने वाले रोहित शेखर का जैविक पिता घोषित कर दिया। इस पूरे घटनाक्रम में तिवारी ने 'निजता के अधिकार' का सवाल उठाया है और कहा है कि उन्हें अपनी तरह से जिंदगी जीने का अधिकार है।
इस बात से इनकार नहीं कि निजता का अधिकार संविधान सम्मत है। यह व्यक्ति के महत्व को स्वीकारने वाला तथा उसे अपनी तरह से जिंदगी जीने का भी अधिकार देता है। उसका खाना-पीना, रहना, आना-जाना, ये सब उसकी निजी इच्छाओं से ही संचालित होते हैं। इसलिए वह किस तरीके की जिंदगी जीये, किस प्रकार अपने घर के भीतर रहे और जीवन में किन चीजों को महत्व दे, इससे किसी का कोई सरोकार नहीं। उसकी निजता को झांकने, दखल देने या उसमें किसी प्रकार की छेड़छाड़ करने का किसी को कोई अधिकार नहीं है। लेकिन निजता की सीमाएं कहां तक आंकी जाएं?

जब व्यक्ति के कार्य, व्यवहार और जीवन में दूसरे व्यक्तियों का भी समावेश हो जाए, तो यह निजता से परे और संबद्ध व्यक्ति से भी जुड़ जाता है। जब यह प्रश्न एक से अधिक का हो जाता है, तब यह सामाजिक व विधिक भी बन जाता है। निजता में आपको अपनी तरह से रहने का तो अधिकार है, पर जीवन समाप्त करने का नहीं। घर में तो आप दरवाजा बंद करके निर्वस्त्र रह सकते हैं, लेकिन बाहर आपका यही व्यवहार अश्लीलता की श्रेणी में आता है, जो सामाजिक और विधिक रूप से मान्य नहीं है। आपकी जिंदगी में कोई दूसरा भी शामिल हो सकता है और उसकी सहमति से आप जो व्यवहार करते हैं, वह भी इस सीमा में आ सकता है।

यह प्रश्न साम्यवादी व्यवस्था के तहत सोवियत संघ के नेता लेनिन के सामने भी आया था कि क्या पुरुष और स्त्री के बीच किया गया यौन व्यवहार प्यास लगने पर पानी पीने के समान है। इस पर लेनिन ने कहा था- नहीं, यह पानी पीने के सिद्धांत से थोड़ा हटकर है, क्योंकि इसमें एक नई जिंदगी का भी जन्म हो सकता है। जब यह तीसरे के आगमन से जुड़ा हो, तो सामाजिक और व्यवस्था के संचालन का प्रश्न बन जाता है, तब यह दो व्यक्तियों की इच्छा और स्वीकृति मात्र तक ही सीमित नहीं रह जाता।

निजता का अधिकार झूठ बोलने का अधिकार कतई नहीं देता, क्योंकि यह विधि द्वारा मान्य नहीं है और ऐसा करने वाले के लिए दंड की भी व्यवस्था की गई है। साथ ही जिस प्रश्न को तिवारी जी निजता का अधिकार बता रहे हैं उसमें उनके अलावा एक महिला और उनका पुत्र भी शामिल हो गया है, इसलिए इनमें से किसी के भी अधिकार का हनन नहीं होना चाहिए। साथ ही स्वीकृत सामाजिक और विधिक मान्यताओं के अनुसार उन्हें न्याय पाने का भी अधिकार है। जब यह नेिजता से आगे चलकर सार्वजनिकता की परिधि में शामिल हो जाता है, तो यह बालक को भी अधिकार देता है कि वह अपने मां-बाप को जाने और उसका उन मर्यादाओं और प्रकरणों में भी व्यवहार करे, जहां यह आवश्यक हो।

यह व्यक्ति की पहचान से भी जुड़ा है, क्योंकि यह पहचान तभी बनती है, जब इसमें मां-बाप का नाम भी शामिल हो। इसके साथ ही इस पहचान को उनके घरों, निवास और क्षेत्र की पहचान से भी जोड़ देता है, क्योंकि यह परंपराओं, वास्तविकताओं, मान्यताओं और विधिक आवश्यकताओं से जुड़ जाता है। अभी तक व्यक्ति के पहचान की दूसरी कोई विधा स्वीकार नहीं की गई है।

नई स्थितियों में सर्वोच्च न्यायालय ने भी संतान के लिए विवाह की जरूरत को निर्णायक नहीं माना है, बल्कि सहजीवन के सिद्धांत को स्वीकार किया है। निजता का अधिकार वहीं समाप्त हो जाता है, जब यह निजता द्वैत का रूप धारण कर लेती है। फिर इसका उपयोग कोई एक करेगा, तो दूसरे के लिए अन्याय कारक बन जाता है। और जब यह मामला विधि सम्मत न्यायालय का बन जाए, तब तो वाद बिंदुओं में निजता का प्रकरण भी निर्णय के लिए समाहित होना चाहिए, पर ऐसा नहीं हो पाया। इसलिए निजता के अधिकार का तर्क संगत नहीं प्रतीत होता।
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