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कानून की सीमाएं और रिश्तों की मर्यादा

Vinit Narain

Updated Thu, 26 Jul 2012 12:00 PM IST
Dowry harassment Central Government Law Supreme Court
दहेज उत्पीड़न के प्रावधान के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार कानून में संशोधन करने का कदम जल्दी उठा सकती है। दुरुपयोग से होने वाले दुष्परिणाम और संशोधन की जरूरत पर विधि आयोग ने सरकार को एक रिपोर्ट भेजी है, जिसके प्रावधानों के दुरुपयोग और इसके चलते समाज में पनपने वाले दुष्प्रभावों के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने सचेत किया था। न्यायालय में आए अनेक ऐसे मामलों को उदाहरण के तौर पर पेश किया गया, जिससे यह जाहिर होता है कि आईपीसी की धारा 498 (अ) का दुरुपयोग हो रहा है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह पहल बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि बीते वर्षों में नगरीय संस्कृति ने वैवाहिक रिश्तों के स्वरूप को बदल दिया है। यह निर्विवाद सत्य है कि पुरुष प्रधान समाज में सदियों से स्त्रियों पर अत्याचार होते आए हैं, चाहे कारण कोई भी हो, पर स्त्री प्रताड़ित होती आई है और इस प्रताड़ना से मुक्ति के लिए वैधानिक स्तर पर अनेकानेक प्रयास किए गए हैं और इन प्रयासों की एक अहम कड़ी ‘दहेज निरोधक’ कानून का निर्माण है।

सदियों पूर्व एक परंपरा का आरंभ भारत में हुआ, जिसमें माता-पिता द्वारा अपनी बच्ची के सुखमय भविष्य के लिए यथोचित धन देकर विदा किया जाता था। शनैः शनैः यह परंपरा विकृत होती गई और इस विकृति ने हजारों स्त्रियों का जीवन लील लिया। 498-ए वह धारा है, जिसमें अगर किसी महिला को उसके ससुर या रिश्तेदार द्वारा दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता है, तो उसे तीन वर्ष या अधिक की सजा हो सकती है। इस कानून के दायरे में दूरदराज के रिश्तेदार, चाहे वह वहां रहते हों या नहीं, भी शामिल हो सकते हैं। यह संज्ञेय अपराध है, यानी बिना कोर्ट के आदेश के पुलिस उनको गिरफ्तार कर सकती है, जिनका नाम एफआईआर में है। यह गैर जमानती भी है। कोर्ट से ही जमानत ली जा सकती है।

बदलते परिवेश में कई बार यह देखने में आया है कि क्रोध और आवेश में या अपने अनुरूप पति या उसके परिवार वालों को ढाल न पाने की स्थिति में पत्नी या उसके परिवार वालों द्वारा दहेज के झूठे मुकदमे दर्ज करवा दिए जाते हैं। आंकड़े यह बताते हैं कि विगत वर्षों में 498-ए में गिरफ्तार किए गए लोगों में से 94 फीसदी लोग दोषी नहीं पाए गए। (प्री-ट्रायल) और ट्रायल पूरा होने के बाद 85 फीसदी दोषी नहीं पाए गए। लेकिन इन्हें भी बिना किसी जांच के गिरफ्तार किया गया। क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में सुधारों को लेकर बनी जस्टिस मलिमथ कमेटी ने भी 2005 में अपनी रिपोर्ट में 498-ए को जमानती और कंपाउडेबल बनाने की सिफारिश की थी, वहीं दहेज कानून के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस और निचली अदालतों को दिशा-निर्देश जारी किए थे कि गहराई से जांच करने के बाद ही दहेज प्रताड़ना के मुकदमे दर्ज किए जाएं।

समाज में स्त्री और पुरुष के मध्य विवाद बढ़े (दहेज निरोधक कानून के संदर्भ मे), इससे पूर्व ही यह आवश्यक हो जाता है कि दहेज निरोधक कानून को लचीला और पारदर्शी बनाया जाए। कानून की धारा 22 से उन मामलों को बढ़ावा मिल रहा है, जो सिर्फ बदला लेने के लिए दायर किए गए हैं। केवल बयान पर ही ससुराल पक्ष के सभी आरोपियों को जेल भेजे जाने की व्यवस्था ने कानून के नाजायज इस्तेमाल को बढ़ा दिया है। अध्ययन इशारा कर रहे हैं कि आमतौर पर पति-पत्नी के मनमुटाव के कारण वर पक्ष का पूरा परिवार सलाखों के पीछे भेज दिया जाता है। रिश्तों पर आरोपों-प्रत्यारोपों का यह खेल परिवार को बिखेर कर रख देता है।

स्त्री-पुरुष का यों एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े होना, किसी भी रूप में वैवाहिक संबंधों के हित में नहीं है। जरूरत है कि एक-दूसरे के प्रति सामंजस्य एवं सहिष्णुता बढ़ाई जाए, क्योंकि अगर रिश्ते कानून के भय की लाठी से हांके जाएंगे, तो कुछ शेष नहीं बचेगा और विवाह संस्था अपना अस्तित्व खो देगी। ‘दहेज’ भारतीय समाज का वह कलंक है, जिसे मिटाना ही होगा। दहेज मांगने वाला जितना दोषी है, उससे अधिक दोषी दहेज देने वाला है। इसलिए वह अभिभावक, जिनकी दृष्टि में बेटी के जीवन का अंततोगत्वा लक्ष्य ‘विवाह’ ही है, और बेटी का घर (ससुराल), दोनों को अपनी सोच बदलनी होगी।
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