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इसलाम, आधुनिकता और पश्चिम की सोच

Vinit Narain

Updated Tue, 24 Jul 2012 12:00 PM IST
Islam modernity and West thinking
जास्मिन क्रांति ने स्वतंत्रता और लोकतंत्र की जो चाहत अरब दुनिया के लोगों में पैदा की थी, उसने तानाशाहों को सत्ता से बेदखल करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके बावजूद यह क्रांति उन लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सकी, जो उसकी मूल भावना में निहित थे। बल्कि तानाशाहों की सत्ता से बेदखली के बाद जो राजनीतिक शून्य उभरा था, उसे नई अधिनायकवादी शक्तियों ने भरने में कामयाबी हासिल कर ली। ऐसे में यह बहस तो छिड़नी स्वाभाविक थी कि क्या इसलाम अधिनायकवाद को बढ़ावा देता है? क्या मध्य-पूर्व में राजनीतिक पिछड़ेपन के लिए इसलाम ही जिम्मेदार है? इसलाम और लोकतंत्र के बीच किस तरह के संबंध हैं? पश्चिमी दुनिया से शुरू हुई यह बहस धीरे-धीरे अब काफी विस्तार पा चुकी है।
येल ग्लोबल मैगजीन में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने इससे संबंधित विभिन्न पहलुओं को विभिन्न स्कॉलरों की विशेष टिप्पणियों सहित प्रस्तुत किया है। रिपोर्ट में एक समाज विज्ञानी अंर्स्ट गैलनर के माध्यम से बताया गया है कि यूरोप के तीन सबसे बड़े मतों में से एक इसलाम आधुनिकता के सबसे करीब है। फिर क्या इसलामी दुनिया के पिछड़ेपन के लिए इसलाम धर्म को कठघरे में खड़ा करना पश्चिमी देशों का वैचारिक प्रोपेगैंडा मात्र है, ताकि सभ्यताओं के संघर्ष को सही ठहराया जा सके? इस संदर्भ में इतिहास के कुछ पन्ने उलटना जरूरी है, ताकि यह देखा जा सके कि यूरोप सही अर्थों में रेनेसां (पुनर्जागरण) और रिफर्मेशन के बाद ही रूपांतरित हुआ।

रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है कि 17वीं शताब्दी से पहले अरब दुनिया यूरोपीय दुनिया के मुकाबले काफी बेहतर थी, क्योंकि मुसलिम व्यापारी दुनिया भर में व्यापार करते थे। एंगस मेडिसन ने इस स्थिति को कुछ आंकड़ों के माध्यम से प्रमाणित करने की कोशिश की है। वर्ष 1000 ई. में अरब दुनिया की जीडीपी विश्व जीडीपी में 10 प्रतिशत हिस्सा रखती थी, जबकि यूरोप की हिस्सेदारी इससे एक प्रतिशत कम थी। लेकिन 17वीं शताब्दी में स्थिति पूरी तरह से बदल गई और वैश्विक जीडीपी में यूरोप की हिस्सेदारी 22 प्रतिशत हो गई, जबकि अरब देश केवल दो प्रतिशत पर ही सिमटकर रह गए। इस परिवर्तन का कारण क्या था? इसकी असल वजह इसलाम धर्म में निहित थी, या बाहरी कारण इसके लिए जिम्मेदार थे?

जीडीपी से जुड़े जिन आंकड़ों को प्रस्तुत किया गया है, वे विशुद्ध रूप से अनुमानित हैं, क्योंकि उस समय ऐसी कोई वैश्विक संस्था विद्यमान नहीं थी, जो आज की तरह जीडीपी के तुलनात्मक आंकड़े प्रस्तुत करती हो। हां, यूरोप के आधुनिक युग में प्रवेश करने के पहले इसलामवादियों के अधीन बड़े साम्राज्य रहे थे, इसलिए मुसलिम/अरब व्यापारियों को अपेक्षाकृत अधिक सुविधाएं हासिल थीं। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक ही था कि इसलामी दुनिया व्यापार के क्षेत्र में आगे रहती। पर जब यूरोप के आधुनिकीकरण की शुरुआत हुई तो उसके साथ-साथ वाणिज्यवाद और उद्योगवाद भी आया, जिसकी संपन्नता और विस्तार के लिए नवोदित यूरोपीय पूंजीवादी शक्तियों के नेतृत्व में साम्राज्यवाद की शुरुआत हुई। इसने एशिया और अफ्रीका के देशों और लोगों को अपना शिकार बनाया।

इसी व्यवस्था ने स्थिति को उलट दिया। रही बात स्वतंत्रता और लोकतंत्र की, तो जैसा कि विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि मुसलिम देशों में स्वतंत्रता और लोकतंत्र की कमी है, पूरी तरह से सही है। जाहिर है, इसलामी स्कॉलरों को अतीत की सभ्यता के खोल से बाहर निकलकर स्वस्थ बहस में हिस्सा लेना चाहिए। यह सच है कि अरबों ने यूरोप को परिवर्तित करने में बड़ा योगदान दिया, लेकिन वे उन्हीं मूल्यों को अपने यहां सुरक्षित नहीं रख पाए।

जास्मिन क्रांति इस दोतरफा दबाव से पैदा हुए प्रतिरोध का ही परिणाम थी, जिसने तानाशाहों को सत्ता से बेदखल कर दिया, पर कट्टरपंथी ताकतों से नहीं बच पाई। ऐसे में बहस को इसलामी धर्मशास्त्रों के बुनियादी सिद्धांतों पर केंद्रित न करके इस समय मौजूद इसलामी कट्टरपंथी ताकतों और उनके धार्मिक-राजनीतिक सरोकार पर केंद्रित किया जाए, तो शायद सार्थक परिणाम आएंगे।
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