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लहरों के बीच नया खतरा

Vinit Narain

Updated Mon, 23 Jul 2012 12:00 PM IST
Dubai U S Navy Firing Indian fishermen Warning
अभी 16 जुलाई को दुबई के जेबल अली बंदरगाह पर अमेरिकी नौसेना के ईंधन आपूर्ति पोत से एक छोटी मोटरबोट पर की गई गोलीबारी में एक भारतीय मछुआरे की मौत हो गई, जबकि तीन अन्य घायल हो गए। अमेरिकी बेड़े ने बाद में एक बयान जारी कर कहा कि उस छोटी मोटरबोट पर हमला इसलिए किया गया, क्योंकि उसने चेतावनी को नजरंदाज कर दिया और बहुत करीब आ गया था। उधर मीडिया की कुछ खबरों में दुबई पुलिस प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल धाही खलफान तमीम के हवाले से कहा गया है कि घायल मछुआरों के अनुसार उन्हें कोई चेतावनी नहीं दी गई थी।
स्थानीय खलीज टाइम्स के मुताबिक घायल मछुआरों ने पुलिस को बताया कि वे अमेरिकी नौसेना के जहाज की तरफ नहीं जा रहे थे, बल्कि उससे बचने का प्रयास कर रहे थे। दुबई पुलिस के हवाले से कहा गया, 'जांच के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मछुआरों ने सच कहा है।' अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया कि यह घटना अंतरराष्ट्रीय जल सीमा में हुई, जबकि संयुक्त अरब अमीरात के अधिकारियों ने कहा कि घटना उसके जल सीमा क्षेत्र में हुई। इस घटना पर भारत में काफी आक्रोश व्यक्त किया गया, घटना की जांच चल रही है।

अमेरिकी नौसैनिकों को दोषी बताने से पहले इसके वस्तुनिष्ठ विश्लेषण की जरूरत है। कुछ पत्रकार इसे खाड़ी में ईरान और अमेरिकी नौसैनिकों के बीच जारी तनाव के संदर्भ में विश्लेषित करने की बात कह रहे हैं। पर इसकी तुलना खाड़ी में अल कायदा और सोमाली लुटेरों की गतिविधियों से करना ज्यादा उचित होगा, क्योंकि ये दोनों छोटी नावों से हमले करते रहे हैं, जिनसे निपटना भारत सहित अन्य देशों के नौसैनिकों के लिए आसान नहीं रहा है। समुद्र में छोटी बोट के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि उसमें दोस्त है या दुश्मन।

अगर बोट में सवार लोगों से संपर्क स्थापित करने और भौतिक रूप से छिपे विस्फोटकों की जांच करने का कोई उपाय नहीं होता है, तो नौसैनिक अपने त्वरित आकलन के आधार पर कार्रवाई करते हैं। अगर उनका आकलन बाद में गलत साबित हुआ, तो उन्हें हत्या का दोषी नहीं बताया जा सकता है।

अक्तूबर, 2000 से पहले जब इस क्षेत्र में न तो अल कायदा और न ही सोमाली लूटेरे सक्रिय थे, उस समय एक सामान्य कायदा यह था कि अमेरिकी नौसैनिक तभी अपनी तरफ बढ़ रहे किसी संदिग्ध बोट पर गोलीबारी करे, जब तक उधर से गोलीबारी न हो। 12 अक्तूबर, 2000 को अल कायदा की विस्फोटकों से भरी एक आत्मघाती बोट ने अदन के बंदरगाह पर यूएसएस कोल नामक अमेरिकी युद्ध पोत को ठोकर मार दी, जिसमें 17 अमेरिकी नौसैनिक मारे गए।

बाद में जांच से पता चला कि निगरानी पर तैनात एक अमेरिकी नौसैनिक ने तेज गति से अपनी तरफ आती हुई बोट देखी थी, पर उसने न तो उस पर गोलीबारी की और न ही उसे डुबोया। चूंकि अल कायदा की बोट से गोलीबारी नहीं हुई थी, इसलिए उसने भी गोलीबारी नहीं की और जब तक वह उस बोट को डुबोता, वह बोट यूएसएस कोल से जा भिड़ी।

नौसैनिक का बचाव करते हुए तब कहा गया था कि चूंकि बंदरगाह के आसपास रसद पहुंचाने के लिए छोटी बोट चलाई जाती हैं, इसलिए किसी छोटी नाव की गतिविधियों के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। अल कायदा ने लिट्टे की तरह आत्मघाती हमले के लिए छोटी नाव का इस्तेमाल शुरू किया, जिससे अनेक देशों की नौसेनाओं को छोटी नावों के बारे में अपनी रणनीति और नियम बदलने पड़े।

इसमें दो परिदृश्य ने विशेष ध्यान खींचा। पहला परिदृश्य, बंदरगाह के भीतर या उसके करीब नौसैनिक जहाज की ओर बढ़ती अज्ञात नाव की स्थिति में संशोधित नियम कहता है कि इससे पहले कि वह संदिग्ध नाव जहाज से टकराए, बिना उसके इरादे की पड़ताल किए तत्काल उसे निष्प्रभावी बनाना चाहिए। निर्दोष नागरिकों के हताहत होने का जोखिम लेकर भी कार्रवाई की पहल की जा सकती है।

दूसरा परिदृश्य, बीच समुद्र में जाते या गश्त पर लगे नौसैनिक जहाज की यदि किसी अज्ञात जहाज से मुठभेड़ हो या वह संदिग्ध परिस्थितियों में दिखे या अपनी तरफ बढ़ता हुआ लगे, तो इसमें जांच की गुंजाइश बनती है। संशोधित नियम कहता है कि नौसैनिकों को तभी गोलीबारी करनी चाहिए, जब वह जहाज जांच का विरोध करे या हमला करे या गोलीबारी की योजना बनाता हुए लगे। इसमें स्थिति का मूल्यांकन और कार्रवाई परिस्थितियों के अनुसार नौसैनिकों के विवेक पर छोड़ दी गई है।

हाल के वर्षों में सोमाली लुटेरों द्वारा अपनाए गए तरीके को देखते हुए कई देशों के नौसैनिकों ने मुठभेड़ के अपने नियमों को परिष्कृत किया है। सोमाली लुटेरे बीच समुद्र में छोटी नावों से हमला करते हैं, जिन्हें बड़े जहाजों से वहां तक लाया जाता है।

जाहिर है, इन हालातों में जहाज पर तैनात सुरक्षा बलों को अपनी तरफ बढ़ते जहाज या संदिग्ध बोट के तत्काल खतरे का आकलन करने के लिए मुठभेड़ के नियमों को मजबूत बनाना होगा। भारत को इस घटना को तार्किक, उचित एवं पेशेवर तरीके से निपटाना चाहिए, क्योंकि एक दिन हमारी अपनी नौसेना भी आतंकविरोधी या लूट विरोधी गश्त के दौरान ऐसी ही स्थिति में फंस सकती है। भावनाओं से वशीभूत होकर और अमेरिकी नौसेना से अनुचित मांग करके हम कहीं अनजाने में अपनी नौसेना को अप्रत्याशित स्थितियों में न डालें।
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