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रिश्तों पर संदेह के बादल

Vinit Narain

Updated Thu, 12 Jul 2012 12:00 PM IST
Afghanistan Pakistan United States NATO route
पाकिस्तान ने आखिरकार अफगानिस्तान में तैनात नाटो सैनिकों के लिए रसद मार्ग खोल ही दिया। पिछले वर्ष नवंबर में ड्रोन हमलों में सीमा पर स्थित एक चौकी पर अपने 24 सैनिकों की मौत के बाद पाकिस्तान ने रसद आपूर्ति के लिए रास्ता देने से इनकार कर दिया था। वह इस बात पर अड़ा था कि अमेरिका उसके सैनिकों की मौत के लिए माफी मांगे। अमेरिका को खेद प्रकट करने में सात महीने और नौ दिन लग गए। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने स्वयं पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार से फोन पर इसके लिए खेद जताया। इसके बाद ही पाकिस्तान ने रास्ता खोलने का फैसला किया।
दरअसल पाकिस्तान पर अमेरिका और नाटो देशों का जबर्दस्त दबाव बना हुआ था। पाक 50 नाटो देशों की नाराजगी मोल नहीं ले सकता था। अमेरिका ने उसे मिलने वाली आर्थिक सहायता भी रोक दी थी, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई थी। बहरहाल, इसके लिए कोई गुप्त या लिखित समझौता नहीं हुआ। हालांकि पाकिस्तान चाहता था कि एक ऐसा समझौता हो जाए, जिसमें सहयोग के क्षेत्रों और उनकी अपनी-अपनी सीमाएं तय की जाएं। लेकिन अमेरिका पहले ही इस तरह के समझौते का इच्छुक नहीं रहा, क्योंकि वर्तमान अनिश्चित व्यवस्थाएं उसके हितों को पूरा करती हैं।

जमीयत-उलमा-ए-इस्लाम के अध्यक्ष मौलाना फजलुर रहमान का कहना है कि मार्ग को दोबारा खोलने के लिए फैसला लेने का अधिकार केवल संसद को है, क्योंकि रास्ता बंद करने का फैसला भी संसद के प्रस्ताव के बाद ही लिया गया था। सरकार के इस फैसले पर पाक तहरीक-ए-इंसाफ के अध्यक्ष इमरान खान ने नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्हें न तो अमेरिका द्वारा जताया गया खेद स्वीकार है, और न ही नाटो के लिए रास्ता खोलना। यह ड्रोन हमले में मारे गए 24 पाकिस्तानी सैनिकों की तौहीन है। तालिबान ने रसद ले जाने वाले ट्रकों को उड़ाने की धमकी ही दे डाली।

पाकिस्तान में रास्ता खोलने का विपक्ष और दक्षिणपंथी पार्टियां भारी विरोध कर रही हैं। छोटे-बड़े शहरों में इसके खिलाफ रैलियां निकाली जा रही हैं। अनेक आतंकवादी संगठनों के समूह दफा-ए-पाकिस्तान काउंसिल के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने लाहौर से इसलामाबाद के लिए 'लांग मार्च' भी निकाला है। मगर सरकार इस फैसले को वापस लेने के मूड में नहीं है, क्योंकि इसका सबसे बड़ा फायदा पाकिस्तान को मिलने वाली सहायता से जुड़ा हुआ है। पाकिस्तान को मदद के रूप में 1.1 अरब डॉलर मिलने हैं। नाटो ट्रकों को अपने यहां से गुजरने देने के बदले उसे प्रति ट्रक 1,000 डॉलर ट्रांजिट फीस भी मिलेगी।

नाटो सप्लाई की बहाली के बावजूद दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की संभावना अभी कम नजर आ रही है। पिछले डेढ़ साल की घटनाओं से पता चलता है कि दोनों देश एक-दूसरे पर से पूरी तरह भरोसा खो चुके हैं और रिश्तों पर शक के साये गहरे हुए हैं। अब भी कई मसले हैं, जिनका हल निकालना जरूरी है। पिछले साल मई में एबटाबाद में अमेरिकी खुफिया कार्रवाई के नतीजे में कुख्यात आतंकवादी अल कायदा सरगना ओसामा-बिन-लादेन की हत्या, रेमंड डेविस केस और दहशतगर्दी के खिलाफ जारी जंग में इन दोनों सहयोगी देशों के रिश्तों में पाई जा रही कशीदगी इतनी आसानी से खत्म नहीं होगी।

अमेरिका जानता है कि पाक फौज कबायली क्षेत्र उत्तरी वजीरिस्तान में छिपे कट्टरपंथी आतंकवादियों के ठिकानों पर कार्रवाई उसके लगातार दबाव के बावजूद नहीं कर रही। उसका मानना है कि यह क्षेत्र हक्कानी नेटवर्क का सुरक्षित स्थान बना हुआ है, जहां पाकिस्तानी सुरक्षा बल उसकी रक्षा कर रहे हैं और पाक की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने उनके साथ गुप्त संपर्क बनाया हुआ है। जबकि यही आतंकवादी अफगानिस्तान में घुसकर नाटो फौजों पर हमले करते हैं।

यद्यपि पाक ने अफगानिस्तान में तैनात नाटो फौजों के लिए रसद मार्ग खोल दिया है, जो अमेरिका-पाक रिश्तों के सुधार की तरफ केवल एक कदम है, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों पर छाए गहरे शक के साये, ड्रोन हमलों का जारी रहना, इत्यादि जैसे कारण फिलहाल अमेरिका-पाक रिश्तों में सुधार नहीं लाने देंगे।
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