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अहिंदी क्षेत्र में हिंदी की हितचिंता

Vinit Narain

Updated Sun, 08 Jul 2012 12:00 PM IST
concern of Hindi  in non Hindi region
ईश्वर चंद्र विद्यासागर, मुंशी तारिणी चरण मित्र, केशव चंद्र सेन, राजा राममोहन राय, जस्टिस शारदा चरण मित्र, अमृत लाल चक्रवर्ती, राजनारायण बसु, रामानंद चट्टोपाध्याय, श्री अरविंद, बंकिमचंद, रवींद्रनाथ ठाकुर, नलिनी मोहन सान्याल जैसे बांग्लाभाषियों द्वारा हिंदी की बहुविध सेवाओं को हिंदी वाले कृतज्ञतापूर्वक याद करते हैं। पश्चिम बंगाल सरकार ने पिछले दिनों हिंदी को दूसरी राजभाषा के तौर पर मान्यता देकर उसी परंपरा को आगे बढ़ाया है। कैबिनेट ने हिंदी के साथ ही उड़िया, संथाली और गुरुमुखी को भी दूसरी राजभाषा की मान्यता दी। ममता सरकार उर्दू को दूसरी राजभाषा के रूप में पहले ही मान्यता दे चुकी है। इस फैसले से पहली बार पश्चिम बंगाल के भाषायी अल्पसंख्यकों का भरोसा जगा है।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश और बिहार की एक बड़ी आबादी पश्चिम बंगाल में रहती है। इन राज्यों के लोग रोजगार के लिए सदियों से कोलकाता जाते रहे हैं। इन लोगों की मातृभाषा हिंदी है। इस विधेयक को कैबिनेट की मंजूरी मिलने के फलस्वरूप जिन जिलों में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या 10 प्रतिशत से अधिक है, वहां वह सरकारी कामकाज की भाषा हो गई है। वाम मोरचा सरकार ने 34 वर्षों के शासन काल में भाषायी अल्पसंख्यकों की मान्यता के लिए कुछ भी नहीं किया। और तो और, दसवीं की परीक्षा देनेवाले लाखों हिंदी भाषियों की हिंदी में प्रश्नपत्र देने की मांग के प्रति भी वह उदासीन रवैया अपनाए हुए थी।

हिंदी भाषियों ने जब जोरदार आंदोलन चलाया, तब जाकर उसने हिंदी में भी प्रश्नपत्र देना शुरू किया था। पश्चिम बंग हिंदी अकादमी को निष्प्राण बनाए रखना और कोलकाता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में कई वर्षों तक प्रेमचंद चेयर खाली रखना हिंदी के प्रति वाम मोरचा सरकार की घनघोर उदासीनता का ही नतीजा था। उसने तो तीन दशक से अधिक के अपने दौर में शायद ही किसी हिंदी भाषी विधायक को मंत्री बनाया हो, जबकि लगनदेव सिंह सरीखे वरिष्ठ विधायक माकपा के टिकट पर जीतते रहे थे। सौंदर्यीकरण के नाम पर वाम सरकार ने कोलकाता-हावड़ा से सारे खटालवालों को भी हटा दिया था, जो हिंदीभाषी थे।

ऐसे में तृणमूल सरकार का यह कदम स्वागतयोग्य है, लेकिन यही काफी नहीं। अब इन भाषाओं के साथ बांग्ला का मेलजोल बढ़ाने पर जोर दिया जाना चाहिए। अपनी भाषा के प्रति प्रेम निस्संदेह अनुकरणीय है, पर दूसरी भाषाओं से मेलजोल न रखने का अर्थ बांग्ला को सीमित करके रखना ही है। जिन अल्पसंख्यक भाषाओं को राज्य सरकार ने मान्यता दी है, उनका श्रेष्ठ साहित्य अभी तक बांग्ला में अनूदित होकर उपलब्ध नहीं है। यह विडंबना नहीं, तो क्या है कि राज्य के अधिकतर बुद्धिजीवी अपने ही देश के त्रिपुरा और पड़ोसी बांग्लादेश के बांग्ला साहित्य से परिचय नहीं करना चाहते।

ऐसे में अल्पसंख्यक भाषाओं के साथ बांग्ला की सांस्कृतिक दूरी को पाटना एक बड़ी चुनौती है। अनुवाद के जरिये ही बंगाल में भिन्न भाषा-भाषियों में पारस्परिक साझेदारी को बढ़ाया जा सकेगा। भारतीय भाषाओं और साहित्य का यह पारस्परिक आदान-प्रदान जितना बढ़ेगा, उतना ही अन्य भाषियों में व्याप्त आशंकाएं दूर होंगी। कहना अतिशयोक्ति नहीं कि पूर्वोत्तर की भाषाओं का हिंदी में अनुवाद नहीं होने के कारण ही पूर्वोत्तर का दर्द भारतीय दर्द नहीं बन पाया है।

पारस्परिकता बढ़ने से सभी भारतीय भाषाएं मिलकर उन समस्याओं से भी लड़ पाएंगी, जिनसे भाषायी अल्पसंख्यक समाज आज जूझ रहा है। यह समाज संप्रदायवाद और क्षेत्रीयतावाद में जकड़ा तो है ही, बाजारवाद की विकृति का भी शिकार है। ऐसे में अपनी भाषा, साहित्य-कला-संस्कृति के प्रति प्रेम निरंतर घट रहा है। भाषायी समाज में पारस्परिकता बढ़ने से वह अपने जातीय तत्त्वों को मिटाने में लगी शक्तियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ सकेगा, अपनी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा कर सकेगा, अपनी समृद्धियों को पहचानने, उन्हें कायम रखने, विकृतियों को दूर करने की दिशा में अग्रसर हो सकेगा और मातृभाषा को साहित्य समाज में पुनर्प्रतिष्ठित कर सकेगा।
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