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समाधान से अभी दूर है यूनान

Vinit Narain

Updated Sun, 24 Jun 2012 12:00 PM IST
Greece  is far from  Solution
पाश्चात्य जगत अपनी संस्कृति का उद्गम, बौद्धिक क्रांति की प्रेरणा तथा आधुनिकीकरण का कारण यूनानी विचारों को मानता है। यह विडंबना ही है कि उस यूनान को आज पाश्चात्य जगत की झिड़कियां और वर्चस्व के अहंकार का शिकार होना पड़ रहा है। यूनान में हुए चुनाव के जो नतीजे आए हैं, उनमें बेल आउट के समर्थक न्यू डेमोक्रेसी पार्टी को 129 सीटें हासिल हुई। दूसरे स्थान पर उग्र वामपंथी दलों के गठबंधन को 71 सीटें तथा सोशलिस्ट पार्टी को 33 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। यूनान के चुनावों में अब तक न्यू डेमोक्रेसी और सोशलिस्ट पार्टी के बीच ही मुकाबला होता रहा है। पर पिछले दो-तीन वर्षों से एथेंस में जो जन-आंदोलन हो रहे थे, उनसे लगता था कि वामपंथियों की सरकार बन सकती है। फिर भी पहली बार यूनान में वामपंथियों को जो बढ़त मिली है, यह महत्वपूर्ण है।
न्यू डेमोक्रेसी की जीत से पूंजीवादी राष्ट्रों को राहत मिली है। यदि वामपंथी सत्ता में आ जाते, तो इसका असर दूसरे राष्ट्रों पर पड़ सकता था। यूनान कैसे दिवालिया हो गया, जनता इसे समझ नहीं पा रही। वर्ष 2000 से 2007 तक यूनान की आर्थिक वृद्धि दर 4.2 फीसदी सालाना थी। उस समय तक वह यूरोपीय राष्ट्रों के बीच सबसे तेज आर्थिक विकास करने वाले देशों में से था। लेकिन आर्थिक विकास के साथ भ्रष्टाचार का भी खुला खेल शुरू हो गया। ओलंपिक खेलों के आयोजन में सीमा से अधिक व्यय हुआ। तुर्की और साइप्रस की समस्या के कारण प्रतिरक्षा पर भी खूब खर्च हुआ। नतीजतन यूनान पर 350 अरब यूरो का कर्ज चढ़ गया। जर्मनी तथा दूसरे समृद्ध देशों की तुलना में यूनानी श्रमिक दोगुने घंटे काम करते हैं। एक समय था, जब जर्मनी में काम करने वाले श्रमिक मुख्यतः यूनानी होते थे। इन श्रमिकों को आज परेशान किया जा रहा है। उनकी आय में कटौती की गई। वहां बेकारी बढ़ रही है और आत्महत्याएं हो रही हैं। अधिकाधिक करों की वसूली के बावजूद मुल्क की स्थिति अच्छी नहीं हुई।

यूनान की जनता जानती है कि राष्ट्र को दिवालिया वहां की सरकारों ने बनाया है। बिना जनादेश के सब कुछ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को सौंपकर मुल्क को गुमराह किया गया। रूढ़िवादी दल न्यू डेमोक्रेसी की अपेक्षा समाजवादी दल की सरकारों ने पूंजी और संपत्ति का अधिक निजीकरण किया। वहां के भ्रष्ट राजनेताओं और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी नहीं हुई। चुनाव में बेशक बेल आउट समर्थकों की जीत हुई है, लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि यूनान का संकट सुलझ जाएगा। इसकी वजह यह है कि लगभग एक तिहाई जनता ने बेल आउट के विरोध में मत दिया है। हालांकि मौजूदा स्थिति में यूनान यूरोपीय संघ से बाहर होना नहीं चाहेगा, क्योंकि इसे वह अपना राष्ट्रीय अपमान मानता है। यूरोपीय संघ के भीतर रहकर वह खुद को सुरक्षित समझता है। लेकिन नई सरकार जो कटौतियां करने जा रही है, बेल आउट की समर्थक जनता क्या उसके पक्ष में रहेगी? आज एथेंस में एक प्याली कॉफी की वही कीमत है, जो लंदन में है, जबकि दोनों मुल्कों की आय में जमीन-आसमान का अंतर है। नई सरकार को जनता के संदेहों को दूर कर उसे इस तर्क का कायल बनाना पड़ेगा कि यूरोपीय संघ से किए जानेवाले समझौतों के पालन में ही बेहतर भविष्य है।

अमेरिका में यदि एक राज्य की स्थिति खराब होती है, तो दूसरे राज्य उसकी सहायता करते हैं। यूरोपीय संघ में अभी ऐसा नहीं है। यूनान के प्रति समृद्ध राष्ट्रों का रुख उदारता का नहीं, बल्कि धमकी देने जैसा रहा है। समस्या केवल यूनान की नहीं है, स्पेन, पुर्तगाल और इटली जैसे देशों की स्थिति भी खराब है। ऐसे में यूरोपीय संघ छिन्न-भिन्न हो सकता है। वस्तुतः यूनान की समस्या का निदान ब्रुसेल्स, फ्रेंकफर्ट और बर्लिन में है। यूरोप के समृद्ध राष्ट्रों को उदारता से यूनान को पर्याप्त आर्थिक सहायता करनी पड़ेगी। जी-20 की बैठक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 456 अरब डॉलर जुटाने का ऐलान किया है। चीन ने 43 अरब डॉलर तथा भारत ने 10 अरब डॉलर के योगदान करने का वायदा किया है। यूनान को पटरी पर लौटाने के लिए इस तरह की मदद की जरूरत है।
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