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फिर ध्वस्त की गई आजाद की स्मृति

Vinit Narain

Updated Wed, 20 Jun 2012 12:00 PM IST
collapse the memory of Chandrashekhar Azad
भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के सेनापति चंद्रशेखर आजाद की इलाहाबाद के रसूलाबाद घाट पर बनाई गई समाधि को 1981 में वहां की नगरपालिका के एक इंजीनियर ने ध्वस्त करवा दिया था। यह 27 फरवरी को उनके बलिदान की अर्द्धशती के आयोजन से ठीक बाद की बात है, जब शहीद आजाद के अनेक क्रांतिकारी साथी जीवित थे और वे सब अल्फ्रेड पार्क में अपने बूढ़े हाथों से उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए उपस्थित हुए थे। भवानी सिंह रावत, भवानी सहाय, रामकृष्ण खत्री, शिव वर्मा, जयदेव कपूर जैसे उनके अनेक क्रांतिकारी साथियों ने आजाद की जिस समाधि पर जाकर सिर नवाया था, उसे नष्ट करने में स्वतंत्र भारत के प्रशासन ने तनिक भी संकोच नहीं किया।
याद आता है कि आजाद की शहादत के बाद अल्फ्रेड पार्क के जिस वृक्ष ने अपनी आड़ देकर उस अजेय क्रांतिकारी को कुछ क्षण के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की पुलिस से सम्मुख युद्ध करने का अवसर प्रदान किया था, जनता द्वारा उसकी पूजा किए जाने पर उसे भी ब्रिटिश अधिकारियों ने कटवा दिया था। और अभी पिछले महीने मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भावरा गांव में आजाद के जन्मस्थान पर उनकी कुटिया के साथ भी वही हुआ, जो उनकी स्मृतियों के साथ पहले घटता रहा था। 23 जुलाई, 1906 को आजाद का जन्म इसी आदिवासी बस्ती में हुआ था, जो भीलों का इलाका है। वह यहीं पले-खेले और बड़े हुए। प्रख्यात साहित्यकार धर्मवीर भारती ने कभी आजाद के इस गांव की यात्रा की थी।

स्वतंत्र भारत में लिखे गए आजादी की लड़ाई के इतिहास में आजाद को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वह हकदार थे। जवाहरलाल नेहरू ने तो अपनी आत्मकथा में उन्हें फासिस्ट मनोवृत्ति तक का कहा। आजाद के बलिदान के अर्द्धशताब्दी वर्ष 1981 में केंद्र सरकार ने हमारे अनुरोध पर उनकी याद में डाक टिकट भी जारी नहीं किया। आजाद भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के सर्वोच्च सेनापति थे। भगत सिंह जैसे बौद्धिक क्रांतिकारी ने उनके नेतृत्व में कार्य किया।

भगत सिंह के समाजवादी लक्ष्य के लिए उनके साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलने में आजाद को कभी हिचक नहीं हुई। क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त ने एक बार आजाद का मूल्यांकन करते हुए कहा था कि समाजवाद के जिस सोपान पर भगत सिंह अनेक पुस्तकों के गंभीर अध्ययन के बाद पहुंचे, आजाद वहां अपने जीवन से पहुंच गए थे। आजाद बौद्धिक दुनिया के थे ही नहीं। वह अति निम्न गरीब तबके से आए थे। उनके लिए लक्ष्य और कर्म प्रधान था।

भावरा में आजाद जिस कुटिया में जन्मे और रहे, वह छप्पर की थी। बाद में 1970 में सरपंच नानालाल जैन ने उसका जीर्णाद्धार कराया। अब उसी कुटिया को ध्वस्त कर दिया गया है। कहा जा रहा है कि आजाद की स्मृति में मंदिर विकसित किए जाने की योजना के चलते ऐसा किया गया है। पर सच तो यह है कि अब आजादनगर कही जाने वाली उस बस्ती पर, जहां आजाद की कुटिया थी, रात में बुलडोजर चलवा दिया गया। जबकि वहां के स्थायी नागरिक उस कुटिया का पुराना स्वरूप बनाए रखना चाहते थे। वे वहां आजाद की एक प्रतिमा लगवाने के लिए भी प्रयत्नशील थे।

स्थानीय नागरिक इसे मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार का अक्षम्य कृत्य मानते हैं। सरकार यह स्पष्टीकरण दे रही है कि आजाद की जन्मस्थली पर ध्वंस की सारी कार्रवाई निर्माण की उस परियोजना के अंतर्गत की जा रही है, जिसे राज्य के पर्यावरण नियोजन और समन्वय संगठन (एप्को), भोपाल ने तैयार किया है। पर इन सारे मामले को लेकर सरकार और विपक्ष आमने-सामने आ गया है। यहां बड़ा सवाल आजाद की स्मृति-रक्षा का है। भावरा की जनता की भावनाएं अधिक महत्वपूर्ण हैं। आखिर क्या कारण है कि आजाद के जन्मशती वर्ष 2006 पर सर्वत्र सन्नाटा बना रहा। सरकारों ने भी उन्हें याद करने की कोई पहल नहीं की। कम्युनिस्ट दलों ने भी नहीं, क्योंकि उनके खांचों में आजाद फिट नहीं होते। कांग्रेस सहित मध्यमार्गी दलों के लिए भी आजाद किसी काम के नहीं। यह नहीं भूलना चाहिए कि इन सबकी उपेक्षा के बावजूद आजाद को जनता का नायकत्व हासिल है।
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