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एक प्रतीक का ध्वस्त होना

Vinit Narain

Updated Mon, 18 Jun 2012 12:00 PM IST
A symbol to be demolished
आठ महिलाओं और चार पुरुषों की शोक संतप्त जूरी द्वारा भेदिया कारोबार के लिए रजत गुप्ता को दोषी ठहराए जाने से न केवल उनके परिजनों को, बल्कि तीस लाख लोगों के मजबूत भारतवंशी अमेरिकी समुदाय और दुनिया भर में फैले उनके प्रशंसकों को धक्का लगा है। इस सुनवाई से पहले उनके जीवन की कहानी बिलकुल एक परी कथा की तरह है।
अठारह वर्ष की उम्र में अनाथ होने के बावजूद आईआईटी, दिल्ली से स्नातक करने के बाद हार्वर्ड विश्वविद्यालय से एमबीए करने वाले रजत गुप्ता मैकेंजी कंपनी के पहले गैर अमेरिकी निदेशक बने। फिर गौल्डमैन सैश के बोर्ड में रहने के अलावा प्रॉक्टर ऐंड गैंबल के बोर्ड में डायरेक्टर, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के सलाहकार, रॉकफेलर फाउंडेशन के ट्रस्टी रहने के अलावा कई प्रतिष्ठित कंपनियों और स्वयंसेवी संगठनों के सलाहकार रहे। इतना ही नहीं, उनकी व्यक्तिगत संपत्ति आठ करोड़ चालीस लाख डॉलर है।

उनके साथ कई मुलाकात के कारण मैं स्वयं दुखी हूं। वह बिलकुल एक आदर्श पुरुष की तरह लगते थे, क्योंकि उनकी सफलता की गाथा कई युवा स्नातकों को प्रेरित करती थी। हैदराबाद में इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस उन्हीं की परिकल्पना थी और वह उसके संस्थापकों में से एक थे। भारत सरकार ने पहले प्रवासी भारतीय सम्मान से उन्हें ही सम्मानित किया। उनका बिल क्लिंटन, बिल गेट्स और कोफी अन्नान जैसी हस्तियों के साथ उठना-बैठना था।

ऐसा शायद ही होता है कि जिस व्यक्ति को जूरी दोषी ठहराती है, उसके लिए दुखी महसूस करे, लेकिन रजत गुप्ता के साथ ऐसा ही हुआ। सबके जेहन में यही सवाल है कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया? कुछ लोग मानते हैं कि और ज्यादा पैसा कमाने के लिए। माना जाता है कि राजरत्नम ने, जिन्हें मदद पहुंचाने के आरोप रजत गुप्ता पर लगे हैं, एक बातचीत (जिसे जांच एजेंसी ने गोपनीय ढंग से टेप कर लिया) में कहा था कि वह बिना कुछ किए पांच से दस करोड़ डॉलर चाहते हैं। ऐसी अटकलें हैं कि गुप्ता अपनी कंपनी न्यू सिल्क रूट के शेयर में राजरत्नम से मदद चाहते थे।

जूरी ने महसूस किया कि वह लालच में आ गए थे। भारतीय मूल के संघीय वकील प्रीत भरारा, जिन्होंने उन्हें बेनकाब किया, भी उनके लिए दुखी महसूस करते हैं। एक दशक पहले एक शीर्ष आईटी कंपनी के प्रमुख को वर्ष का सर्वश्रेष्ठ व्यवसायी चुना गया था। अपनी सोच और नेतृत्व क्षमता के कारण उन्हें आदर्श छवि माना जाता था। मगर इससे जूरी को फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि उसे पता था कि उन्होंने अपने शेयरधारकों के साथ धोखाधड़ी की और करोड़ों रुपयों की बेईमानी की। उसका नाम रामलिंगम राजू था। उन पर धोखा, गबन और भेदिया कारोबार का मुकदमा चल रहा है।

ज्यादा दिन नहीं हुए, एनरॉन नाम की विशाल ऊर्जा कंपनी, जिसकी अनुमानित कीमत कभी 110 अरब अमेरिकी डॉलर थी, के प्रमुख वित्तीय अधिकारी एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने न सिर्फ बोर्ड को गुमराह किया, बल्कि ऑडिट कंपनी आर्थर एंडरसन पर मामले को दबाने का दबाव भी डाला। एनरॉन को दीवालिया घोषित होने पर मजबूर कर दिया गया। उसके कुछ अधिकारी अभी जेल में हैं। हमारे सामने मध्य प्रदेश के आईएएस अधिकारी जोशी दंपति का भी उदाहरण है, जिन्होंने थोड़े ही समय में 350 करोड़ रुपये से ज्यादा कमा लिया। दूसरा उदाहरण, महाराष्ट्र के बुद्धिमान एवं इलेक्ट्रॉनिक गिटार बजाने वाले एक आईएएस अधिकारी का है, जो घूस के लिए कोड का इस्तेमाल करता था।

वर्ष 1994 में रजत गुप्ता ने शिकागो ट्रिब्यून को कहा था कि मैकेंजी प्रतिभाशालियों के लिए है, लेकिन उनके जीवन में एक ऐसा समय आया, जब वह अपनी बात पर टिके नहीं रहे। आखिर क्यों बेहद बुद्धिमान, सफल और प्रतिभाशाली व्यक्ति ऐसे जोखिम उठाकर अपेक्षाकृत ज्यादा वेतन या मुनाफा कमाना और आरामदायक जिंदगी गुजारना चाहता है कि उसकी जिंदगी भर की अर्जित प्रतिष्ठा, यश और प्रसिद्धि झटके में खत्म हो जाती है?

प्रो. दीपक जैन (एशियाई मूल के पहले व्यक्ति, जो केलॉग के डीन बने थे) ने जब संस्कार, नैतिकता और निष्ठा सिखाना शुरू किया, तो कइयों की भवें तन गई थीं। उनका दृढ़ विश्वास था कि यदि शीर्ष अधिकारियों को कॉरपोरेट प्रबंधन में नैतिकता और निष्ठा के मूल्यों के बारे में नहीं बताया गया, तो भारी धोखाधड़ी से इनकार नहीं किया जा सकता। आत्मानुशासन, संतोष, वित्तीय लेन-देन में नियंत्रण एवं संतुलन और नैतिकता एवं निष्ठा किसी भी कंपनी को धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार से बचने में मदद करते हैं। लेकिन लगता है कि धोखाधड़ी और भ्रष्ट कार्यों में लिप्त लोगों ने सही और गलत की लक्ष्मण रेखा को अपने मन से मिटा दिया है।

अंततः यह सफलता की दो विषम धारणाओं, जिसे काफी पहले महात्मा गांधी और चीनी नेता देंग श्याओपिंग ने रेखांकित किया था, के बीच का चुनाव है। गांधी जी कहते थे कि अच्छे उद्देश्यों की प्राप्ति हमेशा अच्छे कार्यों से होती है, जबकि चीन के आर्थिक सुधार के जनक देंग का मानना था कि बिना अच्छे-बुरे का खयाल किए अपना लक्ष्य पाना चाहिए। जिसने भी घोटाले को बढ़ावा दिया, उसने अपने लिए कोई लक्ष्मण रेखा तय नहीं की। चाहे रजत गुप्ता हों या राजू या राजा या कलमाडी, लगता है इन सबने हमारे राष्ट्रपिता गांधी जी के बजाय चीनी कर्णधार देंग श्याओपिंग का अनुसरण किया।
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