आपका शहर Close

चंडीगढ़+

जम्मू

दिल्ली-एनसीआर +

देहरादून

लखनऊ

शिमला

उत्तर प्रदेश +

उत्तराखंड +

जम्मू और कश्मीर +

दिल्ली +

पंजाब +

हरियाणा +

हिमाचल प्रदेश +

छत्तीसगढ़

झारखण्ड

बिहार

मध्य प्रदेश

राजस्थान

एक तिहाई आबादी का दुख

Vinit Narain

Updated Sun, 10 Jun 2012 12:00 PM IST
One third of population suffering
जो खबर जीवन से सीधी जुड़ी होती है, कई बार वही अचर्चित रह जाती है। अमेरिकी संस्था गैलप द्वारा भारत में दुखी महसूस करने वालों की संख्या संबंधी सर्वेक्षण के साथ यही हुआ। इस सर्वेक्षण के मुताबिक, 31 प्रतिशत से ज्यादा यानी करीब एक तिहाई भारत की आबादी दुखी है। दुःख, अवसाद, सुख, उल्लास-ये सब अंतर्मन की अवस्थाएं हैं, पर ये उत्पन्न होतीं हैं बाहरी परिस्थितियों के कारण। जाहिर है कि एक बड़े वर्ग के लिए बाहरी परिस्थितियां या समाज का सामूहिक व्यवहार ऐसा नहीं है, जिसमें वह खुश रह सके।
यह देश इस समय जिस दशा से गुजर रहा है, वह भविष्य के लिए चिंताजनक है। सर्वेक्षण के मुताबिक, किसान और कृषि मजदूरों में दुखी रहने वालों की आबादी सर्वाधिक 38 प्रतिशत है। जबकि पिछले वर्ष इस वर्ग में दुखी रहने वालों की आबादी 31 प्रतिशत थी। सबसे कम करीब 0.6 प्रतिशत दुखी आबादी प्रोफेशनल डिग्रीधारियों की है। हालांकि रोजगाररत आबादी के ज्यादातर तबके में दुखी होने वालों का अनुपात पिछले वर्ष से बढ़ा है, लेकिन यह वृद्धि उतनी नहीं है, जितनी कृषि क्षेत्र में। इसका सीधा निष्कर्ष यही है कि गांव और कृषि को ताकत देने के लिए जितना कुछ किया जाना चाहिए, उतना तो नहीं ही किया गया, दूसरे क्षेत्रों भी ऐसी स्थिति नहीं बन पाई, जिनसे वहां संतुष्ट होने लायक माहौल बन सके।

यह स्थिति अस्वाभाविक नहीं है। केंद्र या राज्यों की सरकारें चाहे जो दावे करें, विकास के वर्तमान ढांचे में वरीयता हमेशा उद्योग और शहर को ही मिलती है। गांव और कृषि हाशिये पर खिसकती जाती है। गांवों में आज वही रहना चाहता है, जिसके पास शहर में बसने का विकल्प नहीं है। कृषि पर भी वही निर्भर है, जिसके पास जीविकोपार्जन के दूसरे साधन उपलब्ध नहीं हैं।

सच कहा जाए, तो गांव एवं कृषि की आपराधिक उपेक्षा को देखते हुए आश्चर्य इस पर होना चाहिए कि दुखी होने वालों की संख्या केवल 38 प्रतिशत क्यों है! अब भी 62 प्रतिशत लोगों ने यदि स्वयं को दुखी नहीं बताया, तो यह भारतीय संस्कार में व्याप्त परंपरागत जिजीविषा और हमेशा बेहतर होने की उम्मीद वाले सामूहिक दृष्टिकोण का परिणाम है। निष्कर्ष साफ है कि अंधाधुंध शहरीकरण के बावजूद जिस देश की 65 प्रतिशत से ज्यादा आबादी अब भी गांवों में है और कुल रोजगार का करीब 60 प्रतिशत कृषि एवं उससे जुड़ी गतिविधियों में ही मिल रहा है, उसकी उपेक्षा खत्म होनी चाहिए। यह तभी होगा, जब गांवों एवं कृषि के अनुकूल माहौल बने। माहौल बनाने में उपयुक्त नीतियों, उनके ईमानदार क्रियान्वयन एवं नीति-निर्माता सहित आम प्रभावी वर्ग के व्यवहार की सम्मिलित भूमिका होती है। गांवों और शहरों तथा उद्योगों, आधुनिक कारोबारों एवं कृषि के बीच नीतिगत एवं व्यवहार के स्तर पर जो भेदभाव है, उसका अंत होना चाहिए।

अगर ऐसा नहीं हुआ, तो दुखी तबके की संख्या और बढ़ेगी और इससे देश के सक्षम होने की संभावनाएं बुरी तरह प्रभावित होंगी। शहरवासी एवं अन्य पेशे में लगे लोगों में भी दुखी होने वालों की संख्या बढ़ रही है। यह विकास की नीतियों से उत्पन्न इस असंतुलन की स्वाभाविक परिणति है। इसमें संघर्षरत लोगों की संख्या पिछले वर्ष के 66 प्रतिशत से घटकर 56 प्रतिशत बताई गई है। लेकिन अगर दुखी होने वालों की संख्या बढ़ी है, तो उसमें इस 10 प्रतिशत का भी हिस्सा शामिल है। यानी लोग जो काम कर रहे हैं, उसमें उनकी रुचि नहीं, वे मजबूरी में करते हैं।

अगर कृषि समुन्नत हो, उसे पुनः सम्मान का काम बना दिया जाए, किसानों और खेत मजदूरों का निर्वाह संतोषजनक ढंग से होने लगे, तो देश की बहुत सारी सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्याओं पर विराम लग जाएगा। शिक्षा का स्तर भी दुख और सुख का निर्धारण करती है। जिसकी उच्च डिगरी, वह कम दुखी। लेकिन सब उच्च या प्रोफेशनल डिगरीधारी नहीं हो सकते और वे भी ज्यादा संख्या में हो जाएं, तो उनके लिए रोजगार की कमी पड़ जाएगी। इसलिए अपने समाज में बढ़ते दुख को कम करने का रास्ता शहरों और गांवों, कृषि और उद्योगों और अन्य कारोबारों के बीच असंतुलनों का अंत करने में ही है।
  • कैसा लगा
Write a Comment | View Comments

Browse By Tags

स्पॉटलाइट

मार्च का पहला हफ्ता इन 7 राश‌ियों के ल‌िए रहेगा भाग्यशाली

  • सोमवार, 27 फरवरी 2017
  • +

भज्जी ने उड़ाया ऑस्ट्रेलिया का मजाक, भारतीय फैंस ने ही दिया जवाब

  • सोमवार, 27 फरवरी 2017
  • +

Oscars 2017: विजुअल इफेक्ट्स में 'द जंगल बुक' ने मारी बाजी

  • सोमवार, 27 फरवरी 2017
  • +

जानें नए कलेवर में लॉन्च नोकिया फोन की खूबियां

  • सोमवार, 27 फरवरी 2017
  • +

जानिए दुनिया के सबसे सम्मानित पुरस्कार 'ऑस्कर' से जुड़ी 10 रोचक बातें 

  • रविवार, 26 फरवरी 2017
  • +

Most Read

तारिक फतह की जगह

Place of Tariq fatah
  • रविवार, 26 फरवरी 2017
  • +

कांग्रेस के हाथ से निकलता वक्त

Time out from the hands of Congress
  • मंगलवार, 21 फरवरी 2017
  • +

पाकिस्तान पर कैसे भरोसा करें

How Trust on Pakistan
  • शुक्रवार, 24 फरवरी 2017
  • +

नेताओं की नई फसल

The new crop of leaders
  • गुरुवार, 23 फरवरी 2017
  • +

भद्र देश की अभद्र राजनीति

Vulgar politics of the Gentle country
  • बुधवार, 22 फरवरी 2017
  • +

पड़ोस में आईएस, भारत को खतरा

IS in neighbor, India threat
  • सोमवार, 20 फरवरी 2017
  • +
TV
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!
Top